
पन्ना से Ground Report: पहले 'उनके' फेफड़े पत्थर हुए, फिर देह मिट्टी...अब किस्मत में है विधवा होने का ठप्पा और खदानों की धूल
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जहां नदी में हीरे बहते हैं, जहां ठोकर मारते ही जमीन हीरा उगलती है, उसी पन्ना जिले का एक गांव है मनौर. पत्थर खदानों में काम करते यहां के ज्यादातर पुरुष कम उम्र में ही खत्म होने लगे. तब से मनौर विधवाओं का गांव हो गया. सांझ के झुटपुटे में यहां मिली एक महिला कहती है- ‘चाहे जितना पुराना हो जाए, दुख नहीं बिसरता’.
'35 साल के थे, जब वो अचानक खत्म हो गए. डॉक्टर बताते, फेफड़ों में धूल भर गई थी. पहले बोलते-बताते थे. बाद में चार कदम चलते मुंह से खून उगलने लगे. उनके जाने के बाद तीन अकेले बच्चे पाले. अब तो वो चेहरा भी ठीक से याद नहीं. न फोटो है, न आधार कार्ड. लेकिन दुख भूलता कहां है! कितना भी खाओ-पियो, हंसो-बोलो- संगी का सोग पकड़े रखता है.'
निकलते हुए हमने मनौर पर ठीक-ठाक होमवर्क कर रखा था. हेडक्वार्टर से दूरी. आबादी. पेशा. कम उम्र विधवाएं...लगभग सब कुछ. लेकिन तैयारी धरी की धरी रह जाती है, जब बातचीत के लिए बुलाने पर ढेर की ढेर महिलाएं इकट्ठा हो जाती हैं.
'ये सब वही हैं'- चूड़ी-बिंदी में सजी एक युवती सूने चेहरों को दिखाते हुए कहती है. 'और भी हैं, जिनके साथ अभी-अभी घटना हुई. वे काम के लिए बाहर जा चुकीं.'
पैंतीस से पैंतालीस.. स्टोन माइन्स में काम करते पुरुष इसी उम्र तक पहुंच पाते हैं. वजह है सिलिकोसिस बीमारी.
खदानों में काम के दौरान सिलिका डस्ट सांस के जरिए लंग्स तक पहुंचकर जम जाती है और फेफड़े सख्त हो जाते हैं. करीब-करीब पत्थर. मरीज ठीक से सांस नहीं ले पाता. दो-चार कदम चलना भी उसे बेदम करने लगता है. आखिर-आखिर में थकान, तेज बुखार के साथ मुंह से खून आने लगता है और मौत हो जाती है.
यह बीमारी लाइलाज है, जिसे महंगे ट्रीटमेंट से सिर्फ मैनेज किया जा सकता है, वो भी कुछ समय के लिए.

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