
नीतीश कुमार का एग्जिट: बिहार में खामोश तख्तापलट
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भारतीय राजनीति में तेरह साल का समय बहुत लंबा होता है. इस एक दशक में मोदी के संभावित चैलेंजर नीतीश कुमार को मोदी-केंद्रित राजनीतिक ब्रह्मांड में 'मार्गदर्शक मंडल' जैसे 'रिटायरमेंट होम' में धकेला जाना, उस नाटकीय शक्ति और वैचारिक बदलाव का उदाहरण है जिसमें धर्मनिरपेक्ष-सांप्रदायिक शब्दावली का अब कोई नैतिक महत्व नहीं रह गया है.
‘मैंने वाजपेयी जी की भाजपा के साथ गठबंधन किया था जो संवैधानिक मूल्यों में विश्वास रखती थी. एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में, मैं नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा का हिस्सा नहीं बन सकता जो हिंदू-मुस्लिम विभाजन पैदा करके वोट जीतना चाहती है.’ जून 2013 में भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ने के बाद नीतीश कुमार.
‘जब मैंने अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था, तो मेरी इच्छा राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ-साथ संसद के दोनों सदनों का सदस्य बनने की थी.’ मार्च 2026 में राज्यसभा में जाने के अपने निर्णय की घोषणा करने के बाद नीतीश कुमार.
भारतीय राजनीति में तेरह साल का समय बहुत लंबा होता है. इस एक दशक में मोदी के संभावित चैलेंजर नीतीश कुमार को मोदी-केंद्रित राजनीतिक ब्रह्मांड में 'मार्गदर्शक मंडल' जैसे 'रिटायरमेंट होम' में धकेला जाना, उस नाटकीय शक्ति और वैचारिक बदलाव का उदाहरण है जिसमें धर्मनिरपेक्ष-सांप्रदायिक शब्दावली का अब कोई नैतिक महत्व नहीं रह गया है.
2005 की सर्दियों में, बख्तियारपुर के एक मृदुभाषी इंजीनियर से नेता बने व्यक्ति ने एक ऐसे राज्य की कमान संभाली जिसे भारत में राजनीतिक पतन के प्रतीक के रूप में व्यापक रूप से खारिज कर दिया गया था. अगले दो दशकों में नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति को फिर से गढ़ा. और, सत्ता में बने रहने के लिए खुद को भी नया रूप दिया. समकालीन भारत में बहुत कम नेताओं ने इतनी बार गठबंधन बदले हैं और सर्वाइव कर पाए हैं. नीतीश की ताजा गुलाटी उनकी पॉलिटिकल जिम्नास्टिक में अंतिम एक्सरसाइज हो सकती है.
जिस तरह से उन्हें राज्यसभा की ओर और पटना के सत्ता के गलियारों से दूर धकेला गया है, वह उस व्यक्ति के लिए सबसे खामोश विदाई है जिसने लगभग बीस वर्षों तक बिहार की राजनीति पर दबदबा बनाए रखा. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रेखांकित करता है कि नरेंद्र मोदी के युग में सत्ताधारी गठबंधन के भीतर शक्ति का संतुलन कितनी निर्णायक रूप से बदल गया है.
भारतीय जनता पार्टी के लिए बिहार लंबे समय से 'अधूरा काम' रहा है. देशभर में अपने दबदबे के बावजूद, पार्टी कभी भी अपनी शर्तों पर राज्य को नियंत्रित करने में सफल नहीं हुई, जिसका मुख्य कारण यह था कि 'मंडलवादी' राजनीतिक माहौल में भाजपा अपनी अगड़ी जाति की छवि को कभी नहीं छोड़ सकी. पिछड़ी जाति के मुखर प्रतीक के रूप में, नीतीश कुमार एक असेट और लिमिटेशन दोनों थे. एक विश्वसनीय गवर्नेंस-केंद्रित सहयोगी जिन्होंने गठबंधन के सामाजिक आधार का विस्तार किया. लेकिन एक क्षेत्रीय नेता भी जिनका कद भाजपा को पोलिटिकल स्पेस लेने से रोकता था.

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