
ना बलिया की सीट मिली, ना मुरादाबाद, MP में भी देनी पड़ी हिस्सेदारी... अखिलेश की प्रेशर पॉलिटिक्स से झुकी कांग्रेस?
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वक्त की मांग को देखते हुए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी साथ हैं. 7 साल बाद एक बार फिर मोदी को हराने के नाम पर यूपी के 2 लड़के मिल तो गए हैं. लेकिन सवाल गर्मजोशी को लेकर है? हालांकि ख्वाब तो पूरी रफ्तार से दौड़ने का था. लेकिन ये साथ 2017 के विधानसभा चुनाव में हार के साथ खत्म हो गया था.
आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन टूटते-टूटते बचा है. एक नेता के फोन से ये रिश्ता बिगड़ते-बिगड़ते बच गया और दोनों दल फाइनली आपस में जुड़ गए हैं. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने अलायंस में महत्वपूर्ण भूमिक निभाई. उन्होंने राहुल गांधी और अखिलेश यादव से फोन पर बात की और गठबंधन की सारी अड़चनों को हटाया. सीटों पर सहमति बनने के बाद अखिलेश का भी बयान आया और उन्होंने कहा, अंत भला तो सब भला.
बात पुरानी है लेकिन कहानी और किरदार वही हैं. वक्त की मांग को देखते हुए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी साथ हैं. 7 साल बाद एक बार फिर मोदी को हराने के नाम पर यूपी के 2 लड़के मिल तो गए हैं. लेकिन सवाल गर्मजोशी को लेकर है? हालांकि ख्वाब तो पूरी रफ्तार से दौड़ने का था. लेकिन ये साथ 2017 के विधानसभा चुनाव में हार के साथ खत्म हो गया था. लेकिन एक बार फिर राजनीतिक मजबूरी ने दोनों के रास्ते एक कर दिए. हालांकि, कांग्रेस को अपनी शर्तों से पीछे हटना पड़ा और सपा को बड़े भाई के रूप में स्वीकारना पड़ा है.
'पहले 20 सीटें मांग रही थी कांग्रेस'
यही वजह है कि अलांयस पर बात बिगड़ते दिखी तो अखिलेश ने साफ कर दिया कि जब तक सीट शेयरिंग तय नहीं होती वो राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा का हिस्सा नहीं बनेंगे. उसके बाद लखनऊ में सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों की तरफ से कोशिश बेनतीजा रही. इसकी वजह कांग्रेस का 20 सीटें मांगना बताया जाता है, जबकि अखिलेश लगातार 17 सीटों का ऑफर दे रहे थे. कांग्रेस ने 17 सीटों के अलावा 3 और सीटों की मांग कर दी थी, जिसमें बिजनौर, मुरादाबाद और बलिया की सीट शामिल है.
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