
दिल्ली शराब घोटालाः दिनेश अरोड़ा बनेंगे सरकारी गवाह, जानिए क्या है कानूनी प्रावधान?
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किसी आरोपी को सरकारी गवाह बनाने और उसे माफी दिए जाने के लिए पुलिस या जांच एजेंसी खुद से फैसला नहीं कर सकती. इसके लिए Code of Criminal Procedure (कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर) में प्रावधान किया गया है.
राजधानी दिल्ली के कई मुद्दों पर केंद्र और राज्य सरकार के बीच तनातनी चली आ रही है. इसी दौरान दिल्ली की शराब नीति को लेकर एक बड़ा घोटाला सामने आया है. जिसमें दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया भी आरोपी हैं. इसी मामले के दूसरे आरोपी कारोबारी दिनेश अरोड़ा ने सीबीआई का सरकारी गवाह बनने की मंजूरी दे दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सरकारी गवाह कौन बन सकता है? इसके लिए कानून में क्या प्रावधान है?
क्या होता है सरकारी गवाह? (What is an official witness?) सबसे पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि सरकारी गवाह क्या होता है? कौन होता है? दरअसल किसी भी आपराधिक मामले में जब पुलिस या जांच एजेंसी को आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिलते हैं या केस कमजोर होता है तो ऐसे में आरोपियों के बीच से ही किसी को पुलिस या जांच एजेंसी माफी का लालच या रिहाई का वादा करके पूरे मामले की हकीकत बयां करने के लिए अपना गवाह बनाती है और वह आरोपी अपने सह आरोपियों के खिलाफ ही अदालत में गवाही देता है तो उसे सरकारी गवाह (Official witness) कहा जाता है. सरकारी गवाह की गवाही पूरे मामले का रुख पलट देती है और पुलिस या जांच एजेंसी का केस मजबूत बन जाता है.
सीआरपीसी की धारा 306 व 307 (Section 306 & 307 of CrPC) किसी आरोपी को सरकारी गवाह बनाने और उसे माफी दिए जाने के लिए पुलिस या जांच एजेंसी खुद से फैसला नहीं कर सकती. इसके लिए Code of Criminal Procedure (कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर) में प्रावधान किया गया है. सीआरपीसी की धारा 306 के तहत सरकारी गवाह बनाए गए शख्स को माफी दिए जाने के लिए याचिका दाखिल की जाती है.
अगर CrPC की धारा 306 (2) के अंतर्गत कोई केस सत्र न्यायालय में विचारणीय है और दंड विधि संशोधन अधिनियम 1952 के अधीन नियुक्त स्पेशल जज की कोर्ट में विचारणीय हैं. और उसे धारा 306 व 307 के तहत माफी दी गई है, लेकिन वह शख्स किसी तरह के तथ्यों को छुपाने की कोशिश करता है या गलत जानकारी देता है या शर्तों का पालन नहीं करता तो उसके खिलाफ मुकदमा दायर किया जा सकता है. इसी तरह से अगर सरकारी गवाह अपने बयान या बात से पलटता है तो उसके खिलाफ झूठा बयान देने का मामला कोर्ट में चलाया जा सकता है.
क्या होती है सीआरपीसी? सीआरपीसी (CRPC) अंग्रेजी का शब्द है. जिसकी फुल फॉर्म Code of Criminal Procedure (कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर) होती है. इसे हिंदी में 'दंड प्रक्रिया संहिता' कहा जाता है. दंड प्रिक्रिया संहिता यानी CrPC में 37 अध्याय हैं, जिनके अधीन कुल 484 धाराएं आती हैं. जब कोई अपराध होता है, तो हमेशा दो प्रक्रियाएं होती हैं, एक तो पुलिस अपराध की जांच करने में अपनाती है, जो पीड़ित से संबंधित होती है और दूसरी प्रक्रिया आरोपी के संबंध में होती है. सीआरपीसी (CrPC) में इन प्रक्रियाओं का ब्योरा दिया गया है.
1974 में लागू हुई थी CrCP सीआरपीसी के लिए 1973 में कानून पारित किया गया था. इसके बाद 1 अप्रैल 1974 से दंड प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी (CrPC) देश में लागू हो गई थी. तब से अब तक CrPC में कई बार संशोधन भी किए गए है.

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