
डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ दीवानगी पर क्यों भारत हाय-तौबा नहीं मचा रहा है?
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ट्रंप की व्यापार नीति के कुछ पहलू भारत के लिए नकारात्मक हो सकते हैं पर बहुत से ऐसे तथ्य भी हैं जो फायदे की उम्मीद दिखा रहे हैं. शायद यही कारण है कि ट्रंप की टैरिफ दीवानगी को लेकर भारत हाय तौबा नहीं मचा रहा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को अपने देश की संसद (कांग्रेस) को संबोधित करते हुए भारत के लिए भी 100 परसेंट टैरिफ की घोषणा कर दी है. ट्रंप के ‘अमेरिका फर्स्ट’ यानी अमेरिकी हित सर्वोपरि रखने के रुख ने पूरे विश्व के व्यापार के अस्तव्यस्त होने का खतरा खड़ा हो गया है. इस बीच यह देखने को मिला है कि बाक़ी देशों की तरह भारत ट्रम्प से भिड़ नहीं रहा है. ट्रम्प के भारत से जुड़े बयानों के बावजूद भारत ने संयम बरता है. इतना ही नहीं भारत कुछ सेक्टर में अमेरिका की चिंता का ख्याल रखते हुए रियायत देने को राजी है. हालांकि कई क्षेत्रों में वह अपनी बात पर कायम रहने को लेकर काम कर रहा है. दरअसल माना जा रहा है कि ट्रंप की व्यापार नीति के कुछ पहलू भारत के लिए नकारात्मक हो सकते हैं पर बहुत से ऐसे तथ्य भी हैं जो फायदे की उम्मीद दिखा रहे हैं. भारत यह समझता है कि देश के लिए बहुत बुरा नहीं होने वाला है, जितना उसे फायदा होने वाला है. शायद यही कारण है कि ट्रंप की टैरिफ दीवानगी को लेकर भारत हाय तौबा नहीं मचा रहा है.
भारत के लिए कई मौके खुलने के आसार
एशिया का जानी मानी अर्थशास्त्री नोमुरा मानती हैं कि ट्रंप के टैरिफ वार का असर भारत के लिए कई मौके खोल सकता है है. ट्रंप चीन पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा कर चुके हैं. चुनाव प्रचार में ट्रंप ने चीन से आयात होने वाले सामान पर 60 प्रतिशत शुल्क लगाने की धमकी दी थी और चार साल के भीतर वहां से इलेक्ट्रॉनिक्स, इस्पात एवं दवा सहित आवश्यक वस्तुओं का निर्यात पूरी तरह खत्म करने का प्रस्ताव भी रखा था. अगर ऐसा होता है तो भारत को व्यापार एवं निवेश के नए मौके खुलेंगे . क्योंकि कंपनियां अब चीन से बाहर विकल्प तलाश रही हैं. नोमूरा लिखती हैं कि चीन से हट रही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के लिए भारत सबसे अहम है क्योंकि यहां बहुत बड़ा उपभोक्ता बाजार है. साथ ही निवेश के स्रोतों में विविधता भी भारत के लिए फायदे की बात है. उनका कहना कि चीनी कंपनियां उत्पादन का ठिकाना बनाने के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में जमकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कर रही हैं, जबकि भारत का रुख कर रही ज्यादातर कंपनियां अमेरिका, यूरोप और एशिया के विकसित देशों की हैं.
नोमुरा के अनुसार अमेरिका रणनीतिक क्षेत्रों में विनिर्माण अपने देश में या सहयोगी देशों में भेज सकता है. सेमीकंडक्टर में ताइवान तथा दक्षिण कोरिया जैसी विकसित एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को लंबे समय की चुनौती झेलनी पड़ेगी क्योंकि अमेरिका अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है. मगर भारत हल्की से मझोली तकनीक वाले विनिर्माण पर ध्यान दे रहा है जबकि भारत प्रतिस्पर्धी देश उच्च तकनीक वाले रणनीतिक क्षेत्रों पर ध्यान दे रहे है. यानी कि निर्यात बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की अभी काफी गुंजाइश है.
अमेरिका को झेलनी होगी ज्यादा दिक्कत
टैरिफ वार में अमेरिका को ज्यादा मुश्किल सामने आने वाली हैं. भारत से जाने वाली दवाएं, कपड़े और मांस, इलेक्ट्रॉनिक सामान आदि महंगे होंगे. अमेरिका में कोविड और यूक्रेन वॉर के चलते पहले ही महंगाई से जूझ रहा है.जाहिर है कि जब रोजमर्रा के सामान महंगे होंगे तो अमेरिकी इसे बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे.खुद अमेरिकी कंपनियां जो भारत में अपने सामान बनाती हैं जैसे एपल आदि वो भी महंगी हो जाएंगी. भारत में अमेरिकी सामान की वैसे भी बहुत कम डिमांड है. अमेरिकी सामान टैरिफ के चलते और महंगे हो जाएंगे . जाहिर है कि भारतीय उसे नकार देंगे. जैसे भारत में कार कंपनी फोर्ड और जनरल मोटर्स को भारतीयों ने नकार दिया. टेस्ला का भी यही हश्र होगा. भारतीयों को अपने देश में बनी टाटा और महिंद्रा की कारें कितनी पसंद हैं इन्हें हम सड़कों पर देख सकते हैं. स्टैंडर्ड एंड चार्टर्ड की एक रिपोर्ट बताती है कि टैरिफ बढने से अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी और लोगों की खरीदने की शक्ति कम हो जाएगी.

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