
झारखंड में दीन, जमीन और जमाईटोला का वो सच, जो aajtak.in ने दिखाया और अब बना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा
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झारखंड विधानसभा चुनाव में बांग्लादेशियों की घुसपैठ और आदिवासी लड़कियों से उनका संबंध सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. पहले ये डर लोकल नेता दबी जबान में जताते थे. धीरे से चिंगारी भड़की. अब हाल ये हैं कि लगभग सभी पार्टियां इसपर कुछ न कुछ कह रही हैं, फिर चाहे वो सबूत देना हो, या आरोप को झुठलाना. हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रोटी-बेटी-माटी को बचाने की गुहार लगा डाली. aajtak.in ने महीनों पहले ही ग्राउंड पर जाकर उन तमाम जिलों के हालात देखे, जहां ये समस्या सबसे ज्यादा बताई जा रही है.
झारखंड में बांग्लादेशी घुसपैठ चर्चा में है. स्थानीय आदिवासियों के बाद अब सेंटर में बैठे लीडर भी आरोप लगा रहे हैं कि पोरस बॉर्डर का सहारा लेते हुए घुसपैठिए न सिर्फ आ रहे हैं, बल्कि उनका टारगेट राज्य के आदिवासी इलाके हैं. ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए हम ग्राउंड पर पहुंचे और मामले की परत-दर-परत पड़ताल की. किन रास्तों से घुसपैठिए भीतर आ रहे हैं. कौन उनके फेक ID बना रहा है. और किसलिए खास ये स्टेट उनके निशाने पर है?
इस दौरान एक टर्म भी छनकर आई- पॉलिटिकल जेहाद! खुद लोकल आदिवासी नेता ये शब्द कहते हैं. उनके देवस्थान और गोचर भूमि को कब्रिस्तान में बदला जा रहा है, इसके दस्तावेज भी वो दिखाते हैं.
क्या कह रही हैं पार्टियां चुनावी रैलियों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे स्टार प्रचारकों के भाषण झारखंड के आदिवासियों के इर्दगिर्द ही घूम रहे हैं. इस दौरान इन नेताओं ने रोटी-बेटी-माटी का नारा देते हुए कहा कि उनकी सरकार आई तो घुसपैठिए खत्म हो जाएंगे और आदिवासियों से उनका हक कोई नहीं छीन सकेगा. हाल में गृह मंत्री शाह ने भी पार्टी का मेनिफेस्टो जारी करते हुए वादा किया कि उनकी पार्टी घुसपैठियों से जमीनें वापस लेने के कानून लाएगी. उन्होंने असम का भी हवाला दिया कि कैसे वहां बीजेपी के आने पर बाहरियों का आना बंद हो गया.
तीखे हमलों की सादी-सी काट राज्य के सीएम हेमंत सोरेन के पास है.
वे घुसपैठियों की बसाहट से सीधा इनकार करते हुए सत्ता पर ही पूर्व बांग्लादेशी पीएम शेख हसीना को शरण देने का आरोप लगा देते हैं. बदलती डेमोग्राफी पर हालांकि वे बात करते से कतराते हैं.
चारों ओर मचे घमासान के बीच कई सवाल भी उठते हैं...-झारखंड तो सीधे बांग्लादेश से सटा हुआ नहीं, फिर क्यों यहां बांग्लादेशियों की बसाहट हो रही है? -क्या घुसपैठ केवल सर्वाइवल के लिए हो रही है, या कोई और वजह है? -दूसरे देश से तंगहाल आए बाहरियों का सपोर्ट सिस्टम कहां है, कैसे करता है काम? -क्या वाकई आदिवासी लड़कियां किसी ट्रैप का शिकार हो रही हैं? -क्या कोई डेटा है जो डेमोग्राफी में फर्क को दिखा सकता है? -क्या बेटी और जमीन लेने के बाद बाहरी लोग स्थानीय राजनीति में भी पैठ जमा रहे हैं? -क्या घुसपैठ ‘आदिवासी बनाम बांग्लादेशी’ की जंग है, या बात इससे भी संगीन है? -अब तक इस मामले पर होम मिनिस्ट्री या झारखंड के किसी भी विभाग ने क्या कार्रवाई की? -अगर सबूत हैं तो क्या केंद्र सरकार अपने-आप एक्शन नहीं ले सकती, या उसके हाथ बंधे हुए हैं? इन तमाम सवालों के जवाबों के लिए संथाल-परगना का सफर करते हुए हमने कई मामले देखे कि कैसे आदिवासी लड़की और तथाकथित घुसपैठिए के बीच संबंध होता है और फिर इसी रिश्ते के जरिए जड़ें जमीन के नीचे फैलती चली जाती हैं.

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