
जोशीमठ जैसे पहाड़ी इलाकों पर कंस्ट्रक्शन में क्या भूल हुई: दिन भर, 9 जनवरी
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उत्तराखंड का जोशीमठ शहर धंसने के कग़ार पर खड़ा है. वहां क्या चल रहा है और लोगों को बचाने के लिए सरकार का एक्शन प्लान क्या है? उत्तराखंड के और किन इलाक़ों में जोशीमठ जैसा ख़तरा मंडरा रहा है? पहाड़ी इलाक़ों में कंस्ट्रक्शन को लेकर क्या सबक हमें याद रखने चाहिए? ब्राज़ील में चुनाव को लेकर हंगामा क्यों बरपा और शराब की हर बूँद आपके लिए कैसे हानिकारक है, सुनिए आज के 'दिन भर' में कुलदीप मिश्र से.
उत्तराखंड के जोशीमठ में लगातार हो रहे भू-धंसाव ने पूरे देश को सकते में डाल दिया है. हर बीतते घंटे के साथ जोशीमठ निवासियों की मुसीबत बढ़ती जा रही है. ज़मीन धसकने से इस शहर में जो मकान टूट चुके हैं, बर्बाद हो चुके हैं, बीते 48 घंटों में उनकी संख्या बढ़कर 600 से ज़्यादा हो गयी है. घरों पर खतरे के लाल निशान लगाए जा रहे हैं. इस पूरे क्षेत्र को 'सिंकिंग ज़ोन' करार दिया गया है. आपदाग्रस्त इलाकों में रहने वाले हज़ारों परिवारों को पुनर्वास केंद्रों में ले जाया जा रहा है.
आप जानते हैं कि कल प्रधानमंत्री ऑफिस में भी इसी मामले पर हाई लेवल मीटिंग हुई. इसके बाद NDRF की एक और SDRF की चार टीमें जोशीमठ पहुंच चुकी हैं. बताया जा रहा है कि केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय और गृह मंत्रालय की टीमें भी जोशीमठ जाएगी. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज इस मुद्दे पर कई संस्थानों से जुड़े एक्सपर्ट्स के साथ हाई लेवल बैठक की. उत्तराखंड सरकार ने इस त्रासदी से निपटने के लिए एक्सपर्ट्स की एक टीम भी बनाई थी. उस टीम ने आज अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. इस रिपोर्ट में क्या बातें सामने आई हैं, सरकार का एक्शन प्लान क्या रहने वाला है? जिस स्केल का संकट है, उसके मुक़ाबले तैयारी भी क्या उतनी मजबूत है, सुनिए 'दिन भर' की पहली ख़बर में.
जोशीमठ के संकट ने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींचा है, लेकिन उत्तराखंड का एक यही इलाक़ा आपदा के आगे मुंह बाये खड़ा नहीं है. कम से कम चार ज़िले ऐसे हैं जहाँ कई गांवों में ज़मीन धंसने की वजह से दरारें उभर आई हैं. कौन से इलाके हैं ये, यहां मामला कितना गंभीर है और इन इलाक़ों में सरकार या लोकल एडमिनिस्ट्रेशन क्या कर रहा है? इसके अलावा जोशीमठ की त्रासदी से क्या सबक इससे लेने की ज़रूरत है और पर्वतीय इलाक़ों में किस किस तरह के रिस्क होते हैं और डेवलपमेंट या कंस्ट्रक्शन के वक़्त किन बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है, सुनिए 'दिन भर' की दूसरी ख़बर में.
साउथ अमेरिका के सबसे बड़े देश ब्राज़ील में तीन महीने पहले चुनाव हुए थे. राइट विंग पॉलिटिशयन हायर बोल्सोनारो सत्ता से बाहर हो गए और सत्ता मिली, लेफ्ट विंग नेता लूला डा सिल्वा को. लेकिन बोल्सोनारो ने नतीजों को स्वीकार करने से इंकार कर दिया. लगा कि मामला कुछ दिनों में ठंडा हो जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. कल ब्राजील से ऐसी तस्वीरें आईं जिसमें हायर बोल्सोनारो के समर्थक हज़ारों की संख्या में देश का झंडा तन पे लपेटे सुप्रीम कोर्ट,राष्ट्रपति भवन और संसद का घेराव कर रहे थे. वहां की इमारतों में तोड़ फोड़ कर रहे थे. उपद्रव के बाद हालात को देखते हुए ब्राजील में 31 जनवरी तक इमरजेंसी लागू कर दी गई है. राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा ने राजधानी के मुख्य हिस्से को भी अगले 24 घंटे तक बंद रखने का आदेश दिया है इसके साथ ही 300 लोगों को अब तक गिरफ्तार भी किया जा चुका है.
घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ब्रासीलिया के गवर्नर को 90 दिनों के लिए उनके पद से हटा दिया. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि बोल्सोनारो के समर्थकों को 24 घंटे के अंदर सभी जगह से हटाया जाए और सभी सड़कों और इमारतों को जल्द खोला जाए. इस घटना को लेकर यूएस प्रेसिडेंट जो बाइडेन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चिंता जाहिर की और राष्ट्रपति लूला डा सिल्वा के पक्ष में अपना समर्थन दिखाया. वहीं बोल्सोनारो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी बताए जाते हैं और ब्राजील जैसी ही घटना को अमेरिका में ट्रंप के समर्थकों ने अंज़ाम दिया था जब 6 जनवरी 2021 को चुनाव हार चुके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक कैपिटल हिल में घुस गए थे और तोड़फोड़ की थी. तो बोल्सोनारो के समर्थकों ने ये हंगामा क्यों किया, बोल्सनॉरो की क्या मांगें हैं, अमेरिका का रोल क्या रहने वाला है और भारत के रिएक्शन के मायने क्या हैं, सुनिए 'दिन भर' की तीसरी ख़बर में.

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