
क्या दिमाग में चिप डालकर इंसानों को कंट्रोल करने की योजना बन चुकी? ब्रेन-चिप मर्जिंग पर क्यों उठ रहे सवाल
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Elon Musk की कंपनी न्यूरालिंक ब्रेन में इलेक्ट्रॉनिक चिप लगाने की योजना में है. कहा जा रहा है कि इससे कई बीमारियों पर काबू हो सकेगा. अगले 6 महीनों में क्लिनिकल ट्रायल भी हो सकता है. इस बीच कई विवाद एक बार फिर उठ गए, जैसे चिप लगाने का मतलब क्या इंसान को जॉम्बी बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है?
सबसे पहले तो इसका इतिहास समझते चलते हैं, जो हमेशा से विवादित रहा. लंबे वक्त तक अमेरिका ने अपने सैनिकों को अफगानिस्तान और इराक में रख छोड़ा. ये लोग जब वापस घर लौटे तो कई तरह की मुश्किलें झेल रहे थे. ज्यादातर डिप्रेशन में चले गए और फैमिली के साथ नहीं रह सके. दबी जबान से ये भी कहा जाता है कि युद्ध से लौटे बहुत से सैनिकों ने खुदकुशी कर ली. वैसे इसमें काफी हद तक सच्चाई ही होगी क्योंकि इससे पहले भी जंग का इतिहास यही कहता है.
शरीर के बाकी अंगों से अलग व्यवहार करता है ब्रेन लड़ाई या तकलीफें देख चुका ब्रेन शांति में भी अलग व्यवहार करता है. इसे ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजुरी (TBI) कहते हैं. अमेरिका के रक्षा विभाग पेंटागन ने सोचा कि ऐसे सैनिकों के दिमाग का बीमार हिस्सा हटा दिया जाए. फिलहाल ये तो मुमकिन नहीं है तो दूसरा तरीका ये सोचा गया कि उसमें चिप लगा दी जाए जो इमोशन्स को कंट्रोल कर सके.
रिपेयर नाम के प्रोजेक्ट की हुई शुरुआत अमेरिका की बेहद तेज-तर्रार और चुपचाप काम करने वाली डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (DARPA) ने इसका जिम्मा लिया. उसने एक प्रोजेक्ट लॉन्च किया, जिसे नाम मिला रिपेयर. इस ब्रेन चिप प्रोजेक्ट को खूब गोपनीयता से शुरू किया गया. ये अलग बात है कि बात लीक हो गई, जिसे संभालने के लिए अमेरिकी सरकार को खुद बयान देकर बात पर लीपापोती करनी पड़ी. उन्होंने माना कि उनका इरादा सिर्फ दिमागी तकलीफ से जूझ रहे सैनिकों को वापस सामान्य बनाना है.
खबर लीक होने के बाद खतरों पर भी बात शुरू हो गई कहा जाने लगा कि ये एक इंसान के दिमाग की सारी जानकारी, सारा तजुर्बा, यहां तक कि सारी गोपनीय बातें निकालकर एक कंप्यूटर चिप में डाल देने जैसा है. जाहिर सी बात है कि अगर चिप कंट्रोल कर सकेगी तो वो सबकुछ जान भी सकेगी. यानी ब्रेन-चिप की ये मर्जिंग काफी खतरनाक हो सकती है. इसके बाद भी स्टडी चलती रही. फिलहाल रिपेयर नाम के इस खास प्रोजेक्ट पर कोई भी पुख्ता जानकारी ओपन सोर्स में कहीं नहीं दिखती, सिवाय मोटा-मोटी बातों के.
इस तरह काम करते हैं प्रोजेक्ट में कर्मचारी दर्पा के तहत लगभग 220 सीनियर एक बिल्डिंग के भीतर लगातार काम कर रहे हैं. इसका हेडक्वार्टर वर्जिनिया में है. इनके अलावा 2 हजार दूसरे लोग भी हैं, जो कॉन्ट्रैक्ट पर हैं. ये लैब में काम करने वाले जूनियर साइंटिस्ट या यूनिवर्सिटी प्रोफेसर्स हैं. इसकी दूसरी शाखाएं भी हैं, जो अलग-अलग तरह से, लेकिन एकदम सीक्रेसी में काम करती हैं. इसमें कथित तौर पर कर्मचारी खुद निगरानी में रहते हैं.
आर्मी को जॉम्बी बनाने की तैयारी? साल 2015 में साइंस लेखिका एनी जेकबसन ने एक किताब लिखी थी- द पेंटागन्स ब्रेन. इसमें उन्होंने कहा था कि कैसे खुफिया तरीके से इसकी तैयारी हो रही है कि आर्मी को जॉम्बी बना दिया जाए. एनी डर जताती हैं कि चिप से सैनिकों का इलाज नहीं होगा, बल्कि उन्हें ऐसी मशीन में बदल दिया जाएगा जो बिना रूके हफ्तों लड़ाई कर सके. जिसे किसी पर दया न आए और जो सिर्फ कत्लेआम मचाए. सख्त से सख्त ट्रेनिंग भी सैनिक को कहीं न कहीं कमजोर बना देती है, लेकिन दिमाग में छेड़छाड़ करके उन्हें मशीन बनाया जा सकेगा.

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