
ऐसी मां जो अपने बेटे के लिए मांग रही मौत की दुआ... मजबूर पेरेंट्स और एक जिंदा लाश की कहानी!
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मौत की आरज़ू और इंतज़ार के बीच एक घर की छत के नीचे ज़िंदगी और मौत के बीच कशमकश जारी है. एक ऐसी कशमकश जिसमें हर रोज़ ज़िंदगी और मौत के बीच जंग होती है और हर रोज़ ज़िंदगी जीत कर भी ये जंग हार जाती है. क्योंकि इस घर में रहने वाले लोग दुआ ज़िंदगी की नहीं मौत की मांगते हैं.
कैसी आरज़ू है ये और कैसा इंतज़ार. आरज़ू है कि मौत आ जाए और मौत है कि इंतज़ार करने को कह रही है. यानी आरज़ू मौत की. इंतज़ार मौत का. एक मां की आरज़ू है कि मौत उसके बेटे को गले लगा ले. इसी आरज़ू के साथ मां आंचल फैलाए अपने बेटे के लिए ऊपर वाले से हर रोज़ मौत मांग रही है. लेकिन ऊपर वाला उसकी सुन ही नहीं रहा है. ऊपर वाले से मायूस होकर वो मां अब अपनी उसी आरजू के साथ अदालत से फरियाद करती है. मगर अदालत भी उस मां की आरज़ू पूरी करने की बजाए उसे इंतज़ार करने को कहती है. इंतजार.. मौत का.
रोज़ ज़िंदगी और मौत के बीच जंग और बस उसी आरज़ू और इंतज़ार के बीच इस घर की छत के नीचे ज़िंदगी और मौत के बीच कशमकश जारी है. एक ऐसी कशमकश जिसमें हर रोज़ ज़िंदगी और मौत के बीच जंग होती है और हर रोज़ ज़िंदगी जीत कर भी ये जंग हार जाती है. क्योंकि इस घर में रहने वाले लोग दुआ ज़िंदगी की नहीं मौत की मांगते हैं. ये कहानी है हरीश की. और छह बाई चार का एक बिस्तर उसकी पूरी दुनिया है. इतनी सी दुनिया होने के बावजूद हरीश पिछले 11 बरस से एक छोटी सी दुनिया तक को नहीं देख पाया है. क्य़ोंकि ना वो उठ सकता है. ना चल सकता है, ना करवट बदल सकता है, ना हंस सकता है. ना रो सकता है. ना बोल सकता है. ना खुद से खा सकता है. ना पी सकता है. यहां तक कि वो अपने दर्द और तकलीफ का इजहार तक नहीं कर सकता. बस यूं समझ लीजिए कि वो एक ज़िंदा लाश है. एक ऐसी ज़िंदा लाश जिसकी धड़कन तो है पर ज़िंदगी नहीं.
बेइंतहा दर्द से गुजर रहा है ये परिवार दिल्ली से सटे गाजियाबाद का एक अपार्टमेंट और उसी अपार्टमेंट की एक मंजिल पर है वो घर. तीन कमरों के उस घर में चार लोग रहते हैं. घर के मुखिया अशोक राणा, उनकी पत्नी निर्मला देवी और छोटा बेटा आशीष. घर के बाकी सभी कमरे आम घरों के कमरे जैसे ही हैं. लेकिन एक कमरा ऐसा है जो इस घर को हर घर से अलग कर देता है. उस कमरे में बिस्तर पर लेटा एक नौजवान. जिसका नाम है हरीश राणा. उम्र यही कोई 32-33 साल. कुछ ना भी कहूं, तो यकीनन इस हाल में हरीश को लेटे देख कर आप बहुत कछ अंदाजा लगा सकते हैं. लेकिन फिर भी आप दर्द की उस इंतेहा का अंदाजा नहीं लगा सकते, जो हरीश के साथ-साथ उसका पूरा परिवार पिछले 11 सालों से सह रहा है.
जिंदा लाश की कहानी कायदे से हम आप जिस दुनिया में रहते हैं, वहां लाशों को घर में रखने की इजाजत नहीं होती. लेकिन जिंदगी और मौत के बीच की इस जिंदा मुर्दा लाश की कहानी ही कुछ ऐसी है कि ना इसे पूरी तरह जिंदा कहा जा सकता है और ना पूरी तरह मुर्दा. और बस इसी दुनियावी कायदे कानून के चक्कर में इस घर के इस कमरे में हरीश पिछले 11 सालों से इसी तरह बस यूं ही लेटा है.
चौथी मंजिल से नीचे गिर गया था हरीश बात 11 साल पुरानी है. तब हरीश और उसके घर वालों की जिंदगी पूरी तरह से गुलजार थी. हरीश इंजीनियर बनना चाहता था. अपने इसी ख्वाब को पूरा करने के लिए 2013 में उसने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया. इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हो चुकी थी. हरीश यूनिवर्सिटी के नजदीक मोहाली में एक पीजी में रह रहा था. पीजी में उसका कमरा चौथी मंजिल पर था. कॉलेज से आने के बाद एक रोज़ हरीश अपने पीजी की बालकोनी पर खड़ा था और अचानक वो उस बालकोनी से नीचे गिर गया. हरीश को फौरन पीजीआई चंडीगढ़ ले जाया गया. उसके सर में गंभीर चोटें आई थीं. सांसें चल रही थी, लेकिन वो होश में नहीं था.
पुलिस ने दर्ज की थी FIR, ये था इल्जाम चूंकि मामला एक्सीडेंट का था, लिहाजा मोहाली पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की. हरीश के घरवालों के तब इल्ज़ाम भी लगाया था कि उनके बेटे को जानबूझ कर कुछ लड़कों ने बालकोनी से नीचे गिराया था. चंडीगढ़ पीजीआई में हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था. डॉक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर लिए थे. लेकिन मां बाप ने हिम्मत नहीं हारी. वो हरीश को पीजीआई चंडीगढ़ से दिल्ली के एम्स ले आए. यहां भी उसका लंबा इलाज चला. पर हालत में कोई सुधार नहीं. एम्स के डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था. एम्स के बाद हरीश को दिल्ली के ही राम मनोहर लोहिया अस्पताल, फिर लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल और उसके बाद फोर्टिस अस्पताल में घर वालों ने भर्ती कराया. लेकिन कहीं कोई फायदा नहीं हुआ.

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