
ईरान संकट में कहां गए मुस्लिम ब्रदरहुड का नारा लगाने वाले
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उम्माह का नारा चुनिंदा मुद्दों पर लगता है ,जब इजराइल या पश्चिम दुश्मन हो. लेकिन जब मुस्लिम देश आपस में टकराते हैं, तो हित, संप्रदाय और शक्ति संतुलन हावी हो जाते हैं. पड़ोसी पाकिस्तान इस्लामी एटम बम की बात करता है पर अमेरिका और इजरायल के आगे वह नतमस्तक रहता है.
ईरान पर हमले को लेकर मुस्लिम वर्ल्ड में जिस तरह का कन्फ्यूजन देखा गया है, वह अपने आप में अलग किस्म का फेनोमिना है. एक तरफ ईरान के समर्थन के लिए कहीं से भी कोई इस्लामी मुल्क साथ नहीं दिखाई दिया. वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर के मुस्लिम शिया-सुन्नी की दीवार तोड़कर ईरान के साथ दिल से खड़े हैं. दुनिया के सभी इस्लामी मुल्क एकजुट होकर ईरान के साथ खड़े हुए होते तो शायद युद्ध की नौबत ही नहीं आती. जबकि पाकिस्तान और भारत के साथ ऑपरेशन सिंदूर के समय तुर्किए ने खुलकर पाकिस्तान के लिए मुस्लिम भाईचारा दिखाया था. हालांकि टर्की को छोड़कर कोई अन्य मुस्लिम देश पाकिस्तान के साथ नहीं आया था. पर ईरान के लिए तो एक भी मुस्लिम देश खुलकर उसके साथ खड़ा होता नहीं दिखा.
दुनिया के मुसलमानों का स्वयंभू नेता बनने वाला और अपने परमाणु बम को इस्लामी बम बोलने वाला पाकिस्तान भी ईरान से दूरी बनाता नजर आया. इतना ही नहीं अंदरखाने से यह भी खबर आई है कि पाकिस्तान ने युद्ध बढने पर अमेरिका को अपने एयर बेस और अन्य संसाधनों को इस्तेमाल की खुली छूट देने का वादा भी किया है.
शायद यही कारण रहा ईरान को भी मुस्लिम देशों पर आक्रमण करने में कोई संकोच नहीं आया. रविवार के बाद सोमवार को भी मिडिल ईस्ट के दुबई, बहरीन, शारजाह, अबू धाबी आदि में ईरान ने जमकर बम गिराए हैं. मंगलवार को भी ईरान मुस्लिम देशों पर कहीं भी रहम करते हुए नजर नहीं आ रहा है. यानि कि मुस्लिम भाईचारा की बात ही बेमानी हो गई है. ईरान पर हमले के लिए मुस्लिम देश अमेरिका को बेस उपलब्ध करा रहे हैं और ईरान अपने मुस्लिम भाइयों पर बम गिराने से बाज नहीं आ रहा है. कुल मिलाकर इस यु्द्ध में मुसलमान ही मुसलमान को ठोंकता नजर आ रहा है. मुस्लिम बंधुत्व का सच अब केवल दिखावे के लिए ही दिख रहा है.
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमला किया. ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ और ‘रोरिंग लायन’ के तहत तेहरान के न्यूक्लियर साइट्स, मिसाइल बेस और सुप्रीम लीडर अली खामेनेई का कंपाउंड निशाना बना. खामेनेई की मौत की पुष्टि हुई, साथ ही दर्जनों IRGC कमांडर मारे गए. ईरान ने तुरंत जवाबी हमले शुरू किए. इजराइल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं और अमेरिकी बेस पर हमले किए, जो बहरीन, कतर, यूएई, कुवैत, जॉर्डन और सऊदी अरब में स्थित थे. इन हमलों से गल्फ देशों में नागरिक इलाकों में भी जबरदस्त नुकसान हुआ है. ईरानी हमलों के चलते सऊदी स्थिति दुनिया की सबसे बड़ी रिफायनरी को बंद कर दिया गया है. हवाई अड्डे बंद हो गए हैं और तेल की कीमतें आसमान छूनी शुरू हो गईं हैं.लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि मुस्लिम दुनिया में एकजुटता की कोई झलक नहीं दिखी.
सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कतर, कुवैत और जॉर्डन ने ईरान के जवाबी हमलों की कड़ी निंदा की. इन देशों ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि ईरान की निंदा की हैं. सऊदी विदेश मंत्रालय ने कहा कि वे इन देशों के साथ पूर्ण एकजुटता में हैं और जरूरत पड़ने पर मदद करेंगे. अरब लीग (22 देशों की) ने भी ईरान के हमलों को शांति और स्थिरता के पक्षधर देशों की संप्रभुता का उल्लंघन बताया. पाकिस्तान ने भी दोहरी प्रतिक्रिया दी. शुरू में ईरान पर हमले को अनुचित बताया, लेकिन ईरान के गल्फ देशों पर हमलों की कड़ी निंदा की और सऊदी अरब, यूएई आदि के साथ पूर्ण एकजुटता दिखाई.
पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान इन भाईचारे वाले देशों के साथ खड़ा है. जॉर्डन, सीरिया और मोरक्को ने भी ईरान के हमलों की निंदा की. तुर्की में कुछ विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन सरकारी स्तर पर कोई मजबूत एकजुटता नहीं दिखी. हमास और हिजबुल्लाह ने ईरान के प्रति सहानुभूति जताना और मुस्लिम एकता की बात करना स्वाभाविक है. लेकिन ईरान के साथ वे खुद कमजोर हो चुके हैं. हूती और कुछ इराकी मिलिशिया ने भी समर्थन दिखाया, लेकिन कोई बड़ा सैन्य या राजनीतिक मोर्चा नहीं बन सका. यह कन्फ्यूजन इसलिए अलग है क्योंकि मुस्लिम दुनिया में “उम्माह” (एकजुट मुस्लिम समुदाय) का नारा हमेशा जोर-शोर से लगता रहा है.फिलिस्तीन, कश्मीर या अन्य मुद्दों पर इसे समर्थन मिलता रहा है. लेकिन यहां ईरान, जो खुद को इस्लामी क्रांति का नेता बताता है, वो अकेला पड़ गया है.

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