
ईरान या इजरायल... जंग में भारत को किसका देना चाहिए साथ? एक्सपर्ट ने बताया कैसी हो रणनीति
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ईरान, इजरायल और अमेरिका में बढ़ते युद्ध के बीच भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि नई दिल्ली को इजरायल, खाड़ी देशों और ईरान के साथ अपने रिश्तों को ध्यान में रखते हुए बेहद सावधानी से रणनीतिक फैसले लेने होंगे.
ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते युद्ध के बीच भारत के सामने बड़ी कूटनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि नई दिल्ली को अपने रणनीतिक हितों, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय साझेदारियों को बचाते हुए बेहद सावधानी से संतुलन बनाकर चलना होगा. भू-राजनीतिक विशेषज्ञ और लेखक माइकल कुगेलमैन का कहना है कि भारत के कई ऐसे देशों से करीबी संबंध हैं जो इस संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल हैं या उससे प्रभावित हो रहे हैं.
माइकल कुगेलमैन के मुताबिक, संतुलन बनाना भारत की विदेश नीति का अहम हिस्सा रहा है और यह उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को दिखाता है. हालांकि मौजूदा हालात में यह संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा. उनका कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और इजरायल के बीच रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं, खासकर रक्षा सहयोग के क्षेत्र में.
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पिछले एक दशक में भारत ने अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत करने के लिए इजरायल से कई उन्नत रक्षा तकनीक और एयर डिफेंस सिस्टम खरीदे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी लगातार गहरी होती गई है. यही वजह है कि मौजूदा संघर्ष में भारत को अपने रुख को लेकर काफी सावधानी बरतनी पड़ रही है.
हालांकि, भारत की रणनीति सिर्फ इजरायल तक सीमित नहीं है. खाड़ी क्षेत्र के देशों के साथ भी भारत के गहरे आर्थिक और ऊर्जा संबंध हैं. सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ भारत के व्यापारिक और ऊर्जा संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं. इसके अलावा खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा और आर्थिक हित भी भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय हैं.
हाल के वर्षों में भारत और ईरान के रिश्ते कुछ ठंडे जरूर पड़े हैं, खासकर तब से जब भारत ने ईरानी कच्चे तेल का आयात काफी कम कर दिया था. इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अब भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है और दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं बनी हुई हैं.

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