
इबादत, फजीलत, रहमत और माफी की रात... शब-ए-बारात की इस्लाम में क्या अहमियत?
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शब-ए-बारात का त्योहार मंगलवार को मुस्लिम समुदाय के लोग मनाएंगे. इस्लाम में शब-ए-बारात की रात की काफी अहमियत है. मुसलमान पूरी रात नमाज, कुरान पढ़ते हैं और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं. मुस्लिम समुदाय के लोग शब-ए-बारात को अपने पुरखों की कब्र पर भी जाते हैं और दुआ पढ़ते हैं.
इस्लाम में शब-ए-बारात त्योहार की काफी अहमियत है. इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से आठवां यानी शाबान के महीने की 15वीं तारीख की रात में शब-ए-बारात मनाई जाती है जो मंगलवार को देश भर में मनाई जा रही है. शब-ए-बारात इबादत, फजीलत, रहमत और मगफिरत की रात मानी जाती है. इसीलिए तमाम मुस्लिम समुदाय के लोग रात भर इबादत करते हैं और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं.
शब-ए-बारात क्यों मनाते हैं मुस्लिम
मंगलवार सात मार्च की शाम को मगरिब की अजान होने के साथ शब-ए-बारात मनाना शुरू करेंगे और बुधवार को शाबान का रोजा भी रखा जाएगा. शब-ए-बारात के त्योहार की रात की काफी अहमियत है. इस पूरी रात मुस्लिम समुदाय के लोग मस्जिद और घरों में इबादत करते हैं. मुस्लिम समुदाय के लोग अपने पूर्वजों की कब्र पर जाकर फातिहा पढ़ते हैं और उनके मगफिरत के लिए दुआ करते हैं.
बरेली के शहर इमाम मौलाना खुर्शीद आलम बताते हैं कि आमतौर पर लोग शब-ए-बारात कहते हैं, लेकिन सही मायने में इसे शब-ए-बराअत कहा जाना चाहिए. इनमें पहला शब्द 'शब' का मतलब रात है, दूसरा बराअत है जो दो शब्दों से मिलकर बना है, यहां 'बरा' का मतलब बरी किए जाने से है और 'अत' का अता किए जाने से, यानी यह (जहन्नुम से) बरी किए जाने या छुटकारे की रात होती है.
शब-ए-बारात पर रात की अहमियत
मौलान खुर्शीद आलम कहते हैं कि वैसे तो साल के सभी दिन रात समान हैं लेकिन इस्लाम में पांच रातें सभी रातों से ज्यादा अहम मानी जाती हैं. ईद की रात, बकरीद की रात, मेअराज की रात, रमजान में शबे कद्र और पांचवीं रात शब-ए-बारात है. इस रात को की जाने वाली हर जायज दुआ को अल्लाह जरूर कुबूल करते हैं. इस पूरी रात लोगों पर अल्लाह की रहमतें बरसती हैं. इसीलिए मुस्लिम समुदाय के लोग रात भर जागकर नमाज और कुरान पढ़ते हैं.

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