
Sitaare Zameen Par Review: खूबसूरत मैसेज के साथ दिल में उतरती है फिल्म, बेहतरीन है आमिर का काम
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फिल्म देखते हुए उसपर पैनी नजर बनाए रखना, स्क्रीनप्ले, एक्टिंग और तमाम तकनीकी पहलुओं पर दिमाग में नोट बनाते चलना हम लोगों के काम का हिस्सा होता है. लेकिन कभी-कभार कुछ ऐसी फिल्में बड़े पर्दे पर हमारे सामने उतरती हैं जिन्हें देखते हुए पता नहीं चलता कि दिल ने कब दिमाग को उठाकर पिछली सीट पर भेज दिया है.
दर्शक के खून में उबाल ला देने, रोमांच से भर देने और कुछ भी कर के जेब से टिकट के पैसे निकलवा लेने की होड़ में जुटी फिल्मों के दौर में 'सितारे जमीन पर' वो फिल्म बनकर आई है, जिसे देखकर निकलते हुए आपके होठों पर मुस्कराहट रह जाती है. किसी भी फिल्म को देखते हुए उसपर पैनी नजर बनाए रखना, उसके स्क्रीनप्ले, एक्टर्स के काम और तमाम तकनीकी पहलुओं पर दिमाग में नोट बनाते चलना हम लोगों के काम का हिस्सा होता है. लेकिन कभी-कभार कुछ ऐसी फिल्में बड़े पर्दे पर हमारे सामने उतरती हैं जिन्हें देखते हुए पता नहीं चलता कि दिल ने कब दिमाग को उठाकर पिछली सीट पर भेज दिया है और स्टीयरिंग अपने हाथों में ले लिया है.
सितारों के गुलशन की कहानी बौद्धिक अक्षमता वाले लोगों के साथ हमारे आसपास के लोगों का बर्ताव काफी शर्मनाक रहा है. ये मानने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि एक खास उम्र और सोशल सेटिंग में आने के बाद ही हम लोगों में 'अपने से अलग' हर व्यक्ति के साथ, कम से कम एक आम इंसान की तरह पेश आने की सेंसिटिविटी और समझ आई है. हालांकि, आज के दौर में भी ये एक दुर्लभ चीज ही है और कभी-कभार ही पाई जाती है. 'सितारे जमीन पर' ऐसे ही कुछ लोगों की कहानी है.
ये एक कोच की कहानी भी है जिसने जिंदगी में कभी अपने किसी डर का सामना ही नहीं किया. वो जब भी जिंदगी के पाटों के बीच फंसता है, तो अपना बूता आजमाने की बजाय भाग खड़ा होता है. चाहे अपने पिता से मिला ट्रॉमा हो, या अपनी पत्नी की इच्छाओं पर खरा उतरने की बात हो, गुलशन अरोड़ा (आमिर खान) से आप यही उम्मीद रखते हैं कि वो जबतक हो सकेगा अकड़ से काम लेगा और जब बात उसके पक्ष में नहीं झुकेगी तो भाग खड़ा होगा. दिल्ली की बास्केटबॉल टीम के असिस्टेंट कोच गुलशन अरोड़ा कोच तो बहुत अच्छे हैं मगर आदमी सही नहीं हैं.
हालांकि, कानून एक ऐसी चीज है जो अच्छे-अच्छे भागने वालों की लगाम खींचना जानता है. एक 'कांड' करने के बाद अरोड़ा साहब पर कोर्ट में ऐसे ही नकेल कसी जाती है. पहली बार अपराध हुआ है इसलिए दया दिखाते हुए जेल नहीं भेजा जाता, मगर उन्हें बैद्धिक अक्षमता वाले लोगों की एक टीम को बास्केटबॉल की कोचिंग देने का आदेश दिया जाता है. गुलशन को इस बात की तसल्ली नहीं है कि वो जेल होने से बच गया है, बल्कि उसे चिंता है कि उसे तीन महीने इन 'पागल' लोगों को कोचिंग देनी होगी.
दिक्कत ये नहीं है कि गुलशन को ऑटिज्म के बारे में नहीं पता, डाउन सिंड्रोम नहीं पता या ऑटिज्म स्पेक्ट्रम नहीं पता. दिक्कत ये है कि वो इन डिसऑर्डर के साथ जन्मे लोगों को 'नॉर्मल' इंसान भी नहीं मानता. गुलशन की एक दिक्कत ये भी है कि वो दूसरों की बात समझना ही नहीं जानता और इसीलिए अपनी पत्नी सुनीता (जेनेलिया डी'सूजा) से भी उसका रिश्ता गड़बड़ चल रहा है. अपनी नई बास्केटबॉल टीम को कोचिंग देते हुए गुलशन के दिमाग के पेंच खुलना और उसके दिल के तार सुलझना 'सितारे जमीन पर' का मुद्दा हैं.
अपनी कमियों से बनी एक परफेक्ट फिल्म बतौर एक्टर या सुपरस्टार नहीं, बल्कि सिनेमा में इमोशनल और सोशल मैसेज देने वाली फिल्मों को बढ़ावा देने वाले एक आर्टिस्ट के तौर पर आमिर खान ने सालों से एक विश्वास कायम किया है. उनके करियर में कुछ भी चल रहा हो मगर ये विश्वास कायम तो रहता ही है. इस बार 'सितारे जमीन पर' से आमिर ने फिर एक बार से उस विश्वास को मजबूत किया है कि वो ऐसी कहानियां को बढ़ावा देते रहेंगे जिनका दिल, इमोशन और मैसेज एकदम सही ठिकाने पर होगा.

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