
Om Birla vs K Suresh: भारतीय राजनीति का 'आयरिश स्विच' गेम कैसे बन गया स्पीकर चुनाव? नतीजे तय लेकिन मायने बड़े हैं!
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दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में संसद के अंदर नंबरगेम की ये जीत-हार दोनों पक्षों के लिए अहम है, खासकर सियासी मैसेज देने के लिए. ये जंग कुछ खास है क्योंकि इसका नतीजा भी सबको पता है और खेल के मोहरे भी. यूरोपीय देश आयरलैंड में कार्ड गेम के एक खास लेकिन शातिर गुण का जिक्र होता है 'आयरिश स्विच'. इसे राजनीति के लिए जरूरी माना जाता है.
पांच दशकों में पहली बार लोकसभा स्पीकर का चुनाव हो रहा है. सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं. एनडीए उम्मीदवार ओम बिरला की जीत पक्की मानी जा रही है लेकिन विपक्ष भी के. सुरेश को उतारकर बड़ा सियासी मैसेज देना चाह रहा है कि पिछले 10 साल की तरह इस बार सरकार की राह आसान नहीं होगी. इस जंग में जीत-हार कोई मायने नहीं रखता, बस हर पक्ष आयरिश स्विच गेम की तरह अपने सारे पत्ते इस्तेमाल कर लेना चाह रहा.
भारत की वर्तमान पीढ़ी ने चुनाव तो कई देखे होंगे लेकिन लोकतंत्र के केंद्र संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में स्पीकर पद के लिए चुनाव होते इस देश ने इससे पहले सिर्फ दो बार देखा है. वो भी बहुत पहले यानी साल 1952 और 1976 में... तीसरी बार अब जंग छिड़ गई है. डिप्टी स्पीकर पद पाने की कांग्रेस की शर्त और संसद में बीजेपी के गुनागणित के बीच स्पीकर चुनाव को लेकर आम सहमति बनने की संभावना खत्म हुई तो चुनाव की नौबत आ गई. इस चुनाव में एनडीए के ओम बिरला एक तरफ हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस की ओर से के. सुरेश मैदान में उतारे गए हैं. ये जंग दरअसल आयरिश स्विच गेम की तरह हो गया है जिसका नतीजा सबको पता है लेकिन अपने सारे कार्ड इस्तेमाल करना हर पक्ष चाह रहा है.
क्योंकि, सियासत में हमेशा आपका सिक्का न सिर्फ चलता रहे बल्कि आपका सितारा चमकता भी रहे इसके लिए जरूरी है कि आप न सिर्फ अपने दोस्तों बल्कि अपने विरोधी खेमे की नब्ज पर भी पकड़ बनाकर रखें. अमेरिका में राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी के नाना जॉन फिज्जेराल्ड के लिए इस टर्म का इस्तेमाल किया जाता था. उनके बारे में कहा जाता था कि वह तो उड़ती चिड़िया से भी अपने लिए वोट डलवा लें. सीनेटर और मेयर का पद उनकी जेब में माना जाता था.
स्पीकर चुनाव का नंबरगेम!
लोकसभा में अगर नंबरगेम की बात करें तो इस बार तस्वीर 2014 और 2019 के मुकाबले काफी अलग है. एनडीए की अगुवाई कर रही बीजेपी 240 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी तो है, लेकिन दो चुनाव बाद पार्टी पूर्ण बहुमत के लिए जरूरी 272 के जादुई आकंड़े से पीछे रह गई. लेकिन, चुनाव पूर्व किया गया गठबंधन काम आया और लोकसभा में एनडीए का संख्याबल 293 है जो कि बहुमत और स्पीकर चुनाव जीतने के लिए जरूरी 272 सीटों से 21 अधिक है.
दूसरी ओर, विपक्ष की बात करें तो कांग्रेस को भी 99 सीटों पर जीत मिली थी, लेकिन राहुल गांधी दो सीट से जीते थे और वायनाड से इस्तीफा दे चुके हैं. इस लिहाज से सांसदों की संख्या 98 रह गई है. लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाले इंडिया ब्लॉक के सदन में कुल 233 सांसद हैं. सात निर्दलीय समेत 16 अन्य भी चुनाव जीतकर संसद पहुंचे हैं लेकिन उनका रोल किसी का पलड़ा भारी कर सके ऐसी नौबत नहीं दिख रही. अब जब इस नंबरगेम के बावजूद इंडिया ब्लॉक ने उम्मीदवार उतारा है तो रणनीति साफ दिख रही है कि मैसेज बड़ा देना है.

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