
Ground Report: ‘सब्जी लेने जाना हो तो भी चाहिए मंजूरी’, आरोपी बरी लेकिन हाथरस की बेटी का परिवार अब तक गिरफ्तार!
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हाथरस का वो घर! लोहे के पुराने ढब दरवाजे के सामने ही सीआरपीएफ के हथियारबंद जवानों की चौकी. कुछ जवान मकान के अगल-बगल. कुछ छत पर. सुरक्षा के लिए लगा ये जमावड़ा ही अब पीड़ित परिवार को खटकता है. मिलते ही पीड़िता के भाई कहते हैं- घर में पड़े-पड़े पत्नी को टीबी लग गई. बच्चों ने आज तक स्कूल नहीं देखा. कहीं जाओ तो एप्लिकेशन देना होगा, मंजूरी मिलेगी, तब जाकर निकलेंगे. इतने में मौका और मन- दोनों बीत जाता है!
सितंबर 2020 को चार कोनों से चार आंधियों की तरह हाथरस के एक घर में लोग आ जुटे. मीडिया भी था. सरकार भी और मददगार भी. सबका वादा कि इंसाफ दिलाकर रहेंगे. चुमकारते हुए ही आंसू पोंछे गए. पुचकारते हुए तसल्लियां दी गईं और फिर सन्नाटा. अब इस घर में कोई आता-जाता नहीं. न सगे वाले, न ही बाहर वाले. सिवाय हर साल होने वाली सितंबरी खड़खड़ाहट के. चार बरस से इंसाफ के इंतजार में बैठे भाई एक कुरेद में सारा गुस्सा- सारी ऊब उगल देते हैं.
पढ़ें, पहली कड़ी: हाथरस से Ground Report: ना ‘बाइज्जत’ रहे, ना ‘बरी’ हुए…आपबीती उन परिवारों की जिनके माथे पर लिख दिया गया “हमारे बच्चे रेपिस्ट हैं!” गेरू-गोबर की छबाई वाले घर में जाते ही पहला घेरा सीआरपीएफ का मिलेगा. वे नाम-परिचय पूछते हुए अधबीच में ही एक फोन करते हैं. शायद अपने अधिकारी को. हमारे बारे में बताया जाता है. फोन रोककर दोबारा तसल्ली होती है, और फिर एक रजिस्टर सामने आ जाता है.
बगल में साल के हिसाब से कुछ और रजिस्टर रखे हुए. इनमें उन मुलाकातियों का नाम-धाम दर्ज है, जो देश-दुनिया के कई कोनों से आए होंगे. अधिकारी पेन खोज रहे हैं. पेन नदारद. इस बीच मैं अपने पर्स से निकालकर अपना ब्यौरा लिख भी चुकी. अधिकारी तिबारा पूछते हैं- फॉलोअप है न! हां में सिर हिलाते ही भाइयों की बुलाहट होती है.
मिनटभर में हम घर के भीतर हैं. गोबर की ताजा लिपाई में गमकती खुली हुई रसोई. भीतर का बड़ा हिस्सा पक्का. अंदर का कमरा खोल दिया जाता है. सामने ही पीड़िता की तस्वीर टंगी हुई. बड़े भाई कहते हैं- वीडियो तो नहीं चाहिए! आज रहने दीजिए. हम ऑडियो पर इंटरव्यू कर लेते हैं.
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