
Crime Katha: 1947 से 2025 तक... वो खलनायक, जिनसे कांपता-घबराता रहा बिहार
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बिहार के जंगलराज में गैंगस्टर्स ने अपहरण, हत्या और राजनीतिक संरक्षण से जुर्म का बड़ा साम्राज्य बनाया. इम सफेदपोश माफियाओं में कामदेव सिंह, मोहम्मद शहाबुद्दीन, सूरजभान सिंह, छोटन-मुन्ना शुक्ला, आनंद मोहन, पप्पू यादव, अनंत सिंह और बबलू श्रीवास्तव के नाम शामिल हैं. जानते हैं 1947-2025 तक बिहार में अपराध के बदलते रूप और राजनीतिक नेक्सस की अनकही दास्तान.
Crime Katha of Bihar: बिहार की मिट्टी में खून, हवा में सत्ता और बंदूक की गूंज हमेशा से गूंजती रही है. साल 1947 से 2025 तक बिहार में गैंगस्टर्स ने अपहरण, हत्या और राजनीतिक संरक्षण के सहारे अपने साम्राज्य खड़े किए. कुख्यात कामदेव सिंह से लेकर मोहम्मद शहाबुद्दीन तक, हर बाहुबली ने जंगलराज की एक नई परिभाषा लिखी. ये कहानी उन्हीं माफियाओं की है, जिन्होंने बूथ कैप्चरिंग से शुरू कर साइबर क्राइम तक का सफर तय किया. बिहार का काला इतिहास लिखा. ऐसा बिहार जहां अपराधी विधायक बने और विधायक अपराधी. 'बिहार की क्राइम कथा' में खोलते हैं इस खौफनाक दास्तान के पन्ने.
1947-1950: आज़ादी के बाद अपराध का बीज स्वतंत्र भारत में बिहार की मिट्टी में उस वक्त अपराध के बीज बोए गए, जब जातीय वर्चस्व और आर्थिक असमानता ने गैंगवार की नींव रखी. साल 1947 में बंटवारे के बाद, बिहार के ग्रामीण इलाकों में भूमिहार और राजपूत समुदायों के बीच छोटे-मोटे विवाद हिंसक होने लगे थे. बेगूसराय जैसे जिलों में तस्करी और डकैती का सिलसिला शुरू हो चुका था, जहां स्थानीय जमींदारों ने अपनी सत्ता बचाने के लिए गुंडों को संरक्षण दिया. कामदेव सिंह जैसे उभरते अपराधी उस दौर के प्रतीक बन गए. कामदेव का जन्म 1930 में हुआ था और 1950 तक वो कई छोटे मोटे अपराधों में शामिल हो चुका था. उस दौर में राजनीतिक अस्थिरता ने पुलिस को कमजोर बना दिया था, जिससे अपराधी बेखौफ हो गए. यही दौर बिहार में जंगलराज की शुरुआत था, जहां कानून की जगह बंदूक चलने लगी थी. साल 1952 के पहले विधानसभा चुनावों में बूथ कैप्चरिंग की शुरुआत हुई, जो बाद में गैंगस्टर्स का हथियार बनी.
1950-1960: बिहार का पहला माफिया डॉन कामदेव सिंह 1950 के दशक में कामदेव सिंह ने बेगूसराय में अपने जुर्म का साम्राज्य स्थापित किया, जो डकैती, तस्करी और राजनीतिक हिंसा पर टिका था. भूमिहार परिवार से ताल्लुक रखने वाले कामदेव सिंह ने कम्युनिस्टों के खिलाफ एंटी-कम्युनिस्ट अभियान चलाया और कांग्रेसी नेताओं के लिए बूथ कैप्चरिंग का काम किया. 1957 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने 34 पोलिंग बूथ कब्जाए, जिससे उनके संरक्षक सूर्युग प्रसाद सिंह की जीत सुनिश्चित हुई. कामदेव सिंह को स्थानीय लोग 'सम्राट' और 'रोबिन हुड' कहते थे. क्योंकि वो गरीबों की शादियां और अंतिम संस्कार का खर्च उठाता था. लेकिन उसकी बेरहमी भी कुख्यात थी; उसने नेपाल से कलकत्ता तक स्मगलिंग नेटवर्क तैयार किया था. 1960 तक कामदेव सिंह का वर्चस्व बिहार के उत्तरी जिलों तक पहुंच गया, जहां उसने गुंडों की फौज खड़ी कर दी थी. यही वो दौर था, जब बिहार में अपराध का राजनीतिकरण शुरू हुआ था, जहां गैंगस्टर्स चुनावी मसल पावर बन गए थे.
1960-1970: राजनीतिक संरक्षण और बढ़ता अपराध 1960 के दशक में कामदेव सिंह का साम्राज्य चरम पर पहुंचा, जब उसने जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान अपनी पकड़ मजबूत की. बेगूसराय से लेकर मुजफ्फरपुर तक उसका नेटवर्क फैला हुआ था, जहां वो हथियारों की तस्करी और डकैती के जरिए कमाई करता था. राजनीतिक दलों ने उसे हायर करना शुरू किया. 1969 के चुनावों में उसने मटिहानी में 34 बूथ कब्जाए. इस दौर में जातीय संघर्ष बढ़ने लगा, जहां भूमिहार गैंग्स ने पिछड़ी जातियों को निशाना बनाया. बाद में कामदेव सिंह के बेटे राजकुमार सिंह ने राजनीति में कदम रखा. पुलिस की नाकामी ने अपराध को बढ़ावा दिया. भ्रष्ट अधिकारी टिप्स देते थे. 1970 तक बिहार में 20-30 बड़े गैंग्स उभर चुके थे, जो रंगदारी और हत्याओं में शामिल थे. यह वो समय था, जब अपराध ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चूसने लगा था.
1970-1980: कामदेव सिंह का पतन 1970 के दशक में कामदेव सिंह 'बिहार का पाब्लो एस्कोबार' बन चुका था, लेकिन 1980 में पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में उसकी मौत हो गई. गंगा नदी किनारे भागते हुए उसे गोली मार दी गई, और उसकी लाश नदी के तट पर मिली थी. कामदेव सिंह की मौत ने बिहार के अपराध जगत में शून्य पैदा किया, लेकिन उसके गुंडों ने नए गैंग्स बना लिए. इस दौर में सूरजभान सिंह जैसे बाहुबली उभरे, जो मोकामा से राजनीति में आए. 26 आपराधिक मामलों के बावजूद, सूरजभान ने साल 2000 में विधानसभा चुनाव जीता. अपराध का स्वरूप बदलने लगा, बूथ कैप्चरिंग के साथ अपहरण बढ़े. कहा जाता है कि लालू प्रसाद यादव के उदय ने अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण दिया. 1980 तक बिहार में जातीय गैंगवार चरम पर पहुंच गया था, जहां ऊपरी जातियों के मिलिशिया ने निचली जातियों को चुनौती दी थी.
1980-1990: जंगलराज का आगाज़ माना जाता है कि बिहार में 1980 के दशक में लालू प्रसाद यादव के सत्ता में आने से जंगलराज शुरू हुआ, जहां गैंगस्टर्स को खुला संरक्षण मिला. मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 1990 में विधानसभा चुनाव जीता, लेकिन उनकी दबंगई 1990 के दशक में चरम पर जा पहुंची. सिवान में उन्होंने किडनैपिंग और हत्याओं का ऐसा सिलसिला शुरू किया, जो खौफ का दूसरा नाम बन गया. उस दौर में छोटन शुक्ला जैसे भूमिहार गैंगस्टर भी उभरे, जो मुजफ्फरपुर में सक्रिय थे. साल 1994 में छोटन शुक्ला की हत्या कर दी गई. इस हत्याकांड ने जातीय हिंसा को हवा दे दी. उसी वक्त बाहुबली आनंद मोहन सिंह ने बिहार पीपुल्स पार्टी बनाई और अपहरण उद्योग को बढ़ावा दिया. यही वो दौर भी था, जब पप्पू यादव ने मधेपुरा में ट्रिगर-हैपी गैंग बनाया. साल 1990 तक 32,000 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें ज्यादातर किडनैपिंग के थे. हालात ये बन चुके थे कि राजनीतिक संरक्षण ने गैंगस्टर्स को अजेय बना दिया था.

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