
74 साल पहले हुई वो बहस, जिससे देश का नाम पड़ा India और Bharat... आंबेडकर का था अहम रोल
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संविधान की मसौदा समिति ने संविधान का जो ड्राफ्ट तैयार किया था. उसमें सबसे अधिक माथापच्ची नाम को लेकर ही हुई थी. संविधान सभा के सदस्यों ने संविधान के मसौदे में संशोधन के प्रस्ताव दिए थे, जिन पर विस्तार से बहस हुई थी. लेकिन इसके बावजूद संविधान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण हिस्सा लंबित था- अनुच्छेद-1. इस बीच डॉ. आंबेडकर समझ गए थे कि यह टेढ़ी खीर साबित होगा.
आज से 74 साल पहले 18 सितंबर 1949 को देश के सबसे प्रबुद्ध लोगों ने इकट्ठे होकर इस बात पर विचार-विमर्श किया कि देश को 'इंडिया' बुलाया जाए या 'भारत' या फिर कुछ और. लेकिन सात दशक बीत जाने के बाद आज भी यह बहस जारी है.
आजाद भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए संविधान सभा की स्थापना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान की प्रमुख मांगों में से एक थी. भारत को सत्ता सौंपने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1946 में जब कैबिनेट मिशन भेजा था, उस समय पहली बार संविधान सभा का गठन किया गया.
नौ दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई थी. इसके बाद दो साल और 11 महीने के अथक प्रयासों के बाद संविधान सभा ने भारतीय संविधान का मसौदा तैयार किया. बता दें कि इस दौरान 166 दिनों की मैराथन चर्चा के बाद इस मसौदे को तैयार किया गया.
हालांकि, संविधान सभा की पहली बैठक दिसंबर 1946 में हुई थी लेकिन 18 सितंबर 1949 को सभा देश के नाम को अंतिम रूप देने में सक्षम हो सकी. लेकिन नामकरण की यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं रही.
मैराथन बैठकों का दौर और विरोध का बिगुल
संविधान की मसौदा समिति ने संविधान का जो ड्राफ्ट तैयार किया था. उसमें सबसे अधिक माथापच्ची नाम को लेकर ही हुई थी. संविधान सभा के सदस्यों ने संविधान के मसौदे में संशोधन के प्रस्ताव दिए थे, जिन पर विस्तार से बहस हुई थी. लेकिन इसके बावजूद संविधान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण हिस्सा लंबित था- अनुच्छेद-1. इस बीच डॉ. आंबेडकर समझ गए थे कि यह टेढ़ी खीर साबित होगा.

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