
‘हमारा पूरा गांव बैठ गया, शादियां हो रहीं कैंसल’… पहलगाम में आज कैसे हैं हालात, पढ़ें Ground Report
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पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले को लगभग चार महीने हो चुके. सैलानियों के आने का पीक सीजन आकर पार भी हो चुका, लेकिन श्रीनगर के लाल चौक और डल झील से लेकर पहलगाम तक सन्नाटा है. थोड़ी-बहुत रौनक है भी तो लोकल पर्यटकों की वजह से, जो कम भीड़ देखकर घूमने आ रहे हैं. बंद पड़े ज्यादातर टूरिस्ट स्पॉट एक-एक कर खोले जा चुके, लेकिन सूनापन इससे बढ़ा ही.
'पांच सालों से कारोबार बढ़िया चल रहा था. अप्रैल-मई-जून में ऐसी भीड़ होती कि लोगों को लौटाना पड़ जाता था. दिन से देर शाम तक काम चलता. अब मामला अलग है. पहलगाम में जो हुआ, उसने पर्यटकों को बिदका दिया. उठता कारोबार ठंडा पड़ गया. अब बस, आने वाले वक्त से कुछ उम्मीद है.'
कश्मीर में घोड़े वालों से लेकर हाउस बोट वाले तक यही बात दोहराते हैं. 'हमारी क्या गलती थी' का भाव बुखार में उतरे स्वाद की तरह जबान में घुलता हुआ.
पहलगाम टैरर अटैक के तुरंत बाद ऑपरेशन सिंदूर चला. भारतीय सेना ने जॉइंट ऑपरेशन चलाकर पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हमला कर उन्हें ध्वस्त कर दिया. अब करीब दो हफ्तों पहले ऑपरेशन महादेव चलाया गया, जिसमें उन आतंकवादियों को भून दिया गया, जिन्होंने बायसरन घाटी में पर्यटकों की हत्या की थी.
इस बीच कई चीजें हुईं. वादियों-घाटियों-झीलों-पहाड़ों वाले कश्मीर में पहली बार पाकिस्तान के खिलाफ खुलकर बात हुई. कैंडल मार्च निकाले गए. रोते हुए स्ट्रीट वेंडर्स ने पर्यटकों से लौटने की अपील की. प्रशासन ने भी सुरक्षा का भरोसा दिलाया. उसके बाद क्या! क्या कश्मीर में रौनक लौट चुकी है. या घाटी में 30 साल पुराना सूनापन लौट आया है!
अटैक के 100 दिन बाद aajtak.in ने वहां पहुंचकर टटोला कि बीते वक्त में क्या बदल चुका, और कितना-क्या बाकी है.
पहलगाम मार्केट और बेताब वैली में कई लोग मिले, जिनके घर पूरी तरह से टूरिज्म के भरोसे चल रहे थे. वे अब भी वहीं रुके हैं. उन्हीं जगहों पर. उसी काम के भरोसे. बस अब व्यस्तता की जगह इंतजार ले चुका.

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