
सुप्रीम कोर्ट ने 9 साल से जेल बंद आरोपी को दी जमानत, कहा- व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि
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सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा है कि जमानत अर्जी पर जल्द सुनवाई करना अभियुक्त का मौलिक अधिकार है. इसी विधान के तहत सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामले में 9 साल से बंद एक आरोपी को जमानत दी है.
सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से जेल में बंद आरोपियों की जमानत को लेकर राहत भरा निर्णय सुनाया है. SC ने जमानत पर रिहाई को लेकर अहम फैसले में कहा है कि अपनी जमानत अर्जी पर शीघ्र सुनवाई हो, ये अभियुक्त का मौलिक अधिकार है. इस अधिकार को जघन्य अपराधों के मामलों में भी छीना या कम नहीं किया जा सकता है. कानून और न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी अभियुक्त की जमानत पर रिहाई के लिए प्रतिबंधात्मक और कठोर प्रावधान संवैधानिक न्यायालय को भी ऐसे विचाराधीन कैदी को जमानत देने से नहीं रोक सकते जो लंबे समय से जेल में बंद है और ट्रायल का कोई अंत नजर नहीं आ रहा है.
9 साल से बंद आरोपी को जमानत दी
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि लंबे समय से जेल में बंद कैदी के मामले में निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होने की संभावना नहीं है, इसलिए यह जमानत देने का अच्छा आधार है. जिसे सिर्फ इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि आरोपी के खिलाफ आरोप बहुत गंभीर है.
सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) यानी UAPA अधिनियम के तहत आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता और उच्च गुणवत्ता वाले नकली भारतीय नोटों की तस्करी के आरोप में ट्रायल का सामना कर रहे एक आरोपी को जमानत दे दी. वो पिछले 9 वर्षों से जेल में बंद था. अपने इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस न्यायालय ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि और पवित्र है.
कोर्ट का कहना था कि यदि किसी संवैधानिक न्यायालय को लगता है कि अनुच्छेद 21 के तहत विचाराधीन अभियुक्त के अधिकार का उल्लंघन हुआ है तो उसे दंड विधान में प्रतिबंधात्मक वैधानिक प्रावधानों के आधार पर जमानत देने से नहीं रोका जा सकता. ऐसी स्थिति में ऐसे वैधानिक प्रतिबंध आड़े नहीं आएंगे. दंड विधान की व्याख्या के मामले में भी, चाहे वह कितना भी कठोर क्यों न हो, संवैधानिक न्यायालय को संविधानवाद और कानून के शासन के पक्ष में झुकना होगा. निजी स्वतंत्रता उसका अभिन्न अंग है.
किसी विशेष मामले के दिए गए तथ्यों में संवैधानिक न्यायालय जमानत देने से इनकार कर सकता है लेकिन यह कहना बहुत गलत होगा कि किसी विशेष विधान के तहत जमानत नहीं दी जा सकती है. क्योंकि ऐसा कहना हमारे संवैधानिक न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांत के विपरीत होगा.

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