
शंकर दयाल शर्मा को अपनी बेटी-दामाद के हत्यारों की दया याचिका सुननी पड़ी, जानिए देश के 9वें राष्ट्रपति का किस्सा
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आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहते हुए शंकर दयाल शर्मा के बेटे और दमाम की हत्या कर दी गई थी. 31 जुलाई 1985 को तीन आतंकियों ने गोलियों की बौछार कर दामाद ललित माकन, उनकी पत्नी गीतांजलि व सहयोगी बाल किशन की हत्या कर दी थी.
देश में एक ऐसी शख्सियत भी राष्ट्रपति बनी, जिसका जीवन उपलब्धियों, विवादों और विडंबनाओं से भरा पड़ा है. एक समय इंदिरा गांधी का खास बनने के लिए अपनों को ही धोखा दे दिया. जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने का उन्हें मौका दिया तो उसे अस्वीकार कर दिया बाद में अपने ही फैसले पर अफसोस करना पड़ा. राष्ट्रपति होते हुए अपने घर नहीं जा सके और घर की गली तक पहुंचने के बाद लौटना पड़ा. जिसने कभी नहीं सोचा था कि उसे अपनी ही बेटी के हत्यारों की दया याचिका को सुनना पड़ेगा. हम बात कर रहे हैं देश के 9वें राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की.
डॉ. शंकर दयाल शर्मा का जन्म 19 अगस्त 1918 में भोपाल में हुआ था. 22 साल की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन से जुड़ गए थे और आजादी के बाद 1952 में भोपाल के मुख्यमंत्री बने. इस तरह से सीएम से लेकर राज्यपाल, उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति बने. 6 दिसंबर 1992 देर रात जब अयोध्या में बाबरी ढांचा ढहाया जा रहा था तब राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा हताश और असहाय महसूस कर रहे थे.
दिल्ली दंगा की साजिश में दामाद था आरोपी
आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहते हुए शंकर दयाल शर्मा की बेटी और दामाद की हत्या कर दी गई थी. यह बात है उस दौर की है जब सिखों का एक तबका इंदिरा गांधी से बुरी तरह खफा था. वजह ऑपरेशन ब्लू स्टार था. 1984 में स्वर्ण मंदिर पर खालिस्तानी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले ने कब्जा कर लिया था. मंदिर को उससे आजाद कराने के लिए इंदिरा गांधी ने यह ऑपरेशन चलाया था, जिसकी जिम्मेदारी जनरल अरुण श्रीधर वैद्य को सौंपी गई थी. भिंडरावाले मार गिराया गया, लेकिन इस ऑपरेशन से सिखों की धार्मिक भावनाएं आहत हो गई थीं. इस ऑपरेशन के चार महीने बाद इंदिरा गांधी की उनके बॉडी गार्ड्स ने ही हत्या कर दी थी.
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