
वीरभद्र फैमिली की नाराजगी, आनंद शर्मा के मंसूबों का टूटना, विधायकों की बगावत और अब क्रॉस वोटिंग... ऐसे हिमाचल में संकट में आई कांग्रेस
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Himachal Politics: हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार की नैया डंवाडोल है. लेकिन ऐसी स्थिति अचानक नहीं आई. नई सरकार बनते ही राज्य में असंतोष के कुछ स्वर बुदबुदाने लगे थे, पर सीएम सुक्खू के कान बगावत की इन आवाजों को सुन नहीं पाए और नतीजा सबके सामने है. इस स्थिति के पीछे कुछ अधूरी महात्वाकांक्षाएं हैं तो कुछ पुराने विवाद.
हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ज्यादा पुरानी नहीं है, मात्र 14 महीने पहले उत्तर भारत में कांग्रेस को जश्न मनाने की वजह देने वाली देवभूमि की ये कांग्रेस सरकार अब लड़खड़ाने लगी है. सीएम सुक्खू के सुख भरे दिन अब लदने वाले हैं और लगता है कि कुर्सी पर जमें रहने के लिए उन्हें तगड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है.
हिमाचल प्रदेश में असंतोष का ये बुलबुला यूं ही नहीं फूटा है. इस असंतोष की नींव तो तब ही पड़ गई थी जब चुनाव जीतने के बाद राज्य में सरकार बनाने की बारी आई. पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के बाद कांग्रेस राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में आई तो ये मौका पार्टी के लिए कई परेशानियां लेकर आई.
सीएम पद की दावेदारी के लिए कई नाम सामने आए. एक दावेदार तो स्वयं वीरभद्र की पत्नी प्रतिभा सिंह थीं. वो रेस में सबसे आगे चल रही थीं.
प्रतिभा सिंह जिस शिमला जिले से ताल्लुक रखती हैं, वहां विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बढ़िया प्रदर्शन किया था और 8 में से 7 सीटें जीती थीं. तब माना जा रहा था कि प्रतिभा को पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के ज़्यादातर नजदीकी नेताओं का समर्थन हासिल है. इसलिए प्रतिभा सिंह की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को मज़बूत माना जा रहा था. प्रतिभा ने चुनाव के बाद कहा भी था कि वीरभद्र सिंह की विरासत और उनके परिवार को अनदेखा नहीं किया जा सकता है.
सीएम नहीं बन सकीं प्रतिभा
लेकिन प्रतिभा सिंह के लिए जो सबसे प्लस प्वाइंट था वही उनके लिए सबसे निगेटिव प्वाइंट भी बन गया. अगर प्रतिभा को कांग्रेस आलाकमान सीएम की कुर्सी सौंपती तो पार्टी पर परिवारवाद का आरोप लगता. इन आरोपों से केंद्र में पार्टी पहले ही जूझ रही थी. इन परिस्थितियों में 2013 से 2019 तक हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रह 59 वर्षीय सुखविंदर सिंह सुक्खू बाजी मार ले गए और सीएम बन गए.

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