
रविंद्र सिंह भाटी, राजपूत और राजकुमार रोत... क्या राजस्थान में BJP का काम खराब करेंगे ये RRR?
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राजस्थान में पिछले दो लोकसभा चुनावों से बीजेपी क्लीन स्वीप कर रही है. इस बार अपने 400 प्लस का टार्गेट हासिल करने के लिए बीजेपी को राजस्थान से बड़ी उम्मीद है. पर वहां अचानक चिंता का कारण बन गए हैं तीन 'R', जिनके कारण मोदी की तीसरी बार प्रधानमंत्री बनवाने का लक्ष्य लेकर चल रही पार्टी अचानक घिरती नजर आ रही है.
राजस्थान में राजपूत, रविंद्र सिंह भाटी और राजकुमार रोत यानि RRR ने बीजेपी के माथे पर चिंता की लकीरें ला दी हैं. बीजेपी के 400 पार के नारे को गति राजस्थान जैसे राज्य में क्लीन स्वीप से ही मिल सकती थी. पर अब ऐसा लगता है कि बीजेपी की इस राह में कांटे ही कांटे पैदा हो रहे हैं. बाड़मेर में छात्र नेता रविंद्र सिंह भाटी ने और बांसवाड़ा में भारतीय आदिवासी पार्टी के राजकुमार रोत ने अपने नामांकन के दिन जो भीड़ जुटाई है उससे बीजेपी के कान खड़े हो गए हैं. बांसवाड़ा में बीजेपी के केंद्रीय मेंत्री कैलाश चौधरी की साख दांव पर लग हुई है. सबसे बड़ी बात यह है कि बाडमेर और बांसवाड़ा हैं तो संख्या में केवल 2 सीटें पर इनका प्रभाव कई सीटों पर पड़ सकता है. बीजेपी इन दोनों सीटों को जितना प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाएगी उतना ही इसका प्रभाव दूसरी सीटों पर पड़ने की आशंका है. बाडमेर में रविंद्र सिंह भाटी से हुए डैमेज को कंट्रोल के लिए पीएम नरेंद्र मोदी ही नहीं, बीजेपी के अन्य सितारे जैसे योगी आदित्यनाथ, राजनाथ सिंह आदि भी मैदान में उतर रहे हैं. इसके साथ ही फिल्मी सितारों की फौज बाड़मेर में उतारने की तैयारी है. आखिर ऐसा क्या हो गया है कि बीजेपी को इस तरह आक्रामक मोड में आना पड़ रहा है.
1-बाड़मेर क्यों बना बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न
बाड़मेर से बीजेपी प्रत्याशी कैलाश चौधरी केंद्र सरकार में मंत्री हैं और इस सीट से सांसद हैं. बीजेपी ने एक बार फिर उन पर दांव खेला है. चौधरी के मुकाबले कांग्रेस ने आरएलपी से आए उम्मेदा राम को उतारा है. पर बीजेपी का असली मुकाबला एक ऐसे युवा से है जो इसी साल निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में शिव विधानसभा सीट से चुनाव जीत चुका है. मात्र 26 साल के इस युवा ने पहले शिव विधानसभा सीट से बीजेपी का टिकट चाहा, नहीं मिलने पर स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर जनता के बीच आया और कांटे की टक्कर में सबको हराकर जीत दर्ज की. बीजेपी उम्मीदवार की तो जमानत भी जब्त हो गई थी. इसके पहले भी इस युवा को जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय छात्र यूनियन के लिए भी एबीवीपी से इनकार ही मिला था, फिर भी यह युवा निर्दलीय होकर भी भारी मतों से विजयी हुआ था. इस युवा का नाम है रविंद्र सिंह भाटी, जिसे सोशल मीडिया ने स्टार बना दिया है. भाटी ने बीजेपी से सांसदी का भी टिकट चाहा था पर पार्टी की ओर से पुराना किस्सा ही दुहराया गया. अब भाटी को भारी जनमसमर्थन मिलते देख सभी के कान खड़े हो गए हैं.
बाड़मेर संसदीय सीट के लगभग 18.5 लाख वोटर्स में जाटों के साथ राजपूतों का भी दबदबा है. संसदीय क्षेत्र में 16.59 फीसदी एससी (अनुसूचित जाति) और 6.77 फीसदी एसटी (अनुसूचित जनजाति) जनसंख्या है. यहां 4.5 लाख जाट, 3.5 लाख राजपूत, 4 लाख एससी-एसटी, 3 लाख अल्पसंख्यक और बाकी दूसरी जातियों के वोटर हैं. बीजेपी के साथ दिक्कत यह है कि बाड़मेर में कांग्रेस का प्रत्याशी भी जाट है. रविंद्र सिंह भाटी अकेले राजपूत होने के चलते राजपूत वोटों के अकेले मालिक हैं. भाटी के निर्दलीय उतरने से राजपूत वोट एकतरफा उनके खाते में जाने की उम्मीद है.
2-बांसवाड़ा के माहौल से अन्य सीटों पर भी बढ़ेगी मुश्किल
2023 के विधानसभा चुनावों में डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिलों में तीन सीटें जीतकर बीएपी (भारतीय आदिवासी पार्टी) ने पहले ही बीजेपी के लिए खतरे के संकेत दे दिए थे. अपने पहले ही चुनावी मुकाबले में, BAP ने तीन सीटें - आसपुर, चोरासी और धरियावद - जीतकर दक्षिणी राजस्थान में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभरी. अब लोकसभा चुनावों में भारत आदिवासी पार्टी की एंट्री ने बांसवाड़ा-डूंगरपुर लोकसभा सीट पर मुकाबला बेहद रोचक बना दिया है. बाप ने विधायक राजकुमार रोत को यहां प्रत्याशी बनाया है. हालिया विधानसभा चुनावों में राजकुमार रोत उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी के बाद सबसे ज्यादा वोटों से जीतने वाले विधायक बने हैं.

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