
महाराष्ट्र में सत्ता का खेल और वो 5 सवाल... सुप्रीम कोर्ट में राज्यपाल रहे कोश्यारी के रोल को लेकर उठे सवाल
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असली शिवसेना के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने अहम टिप्पणी की. सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की भूमिका पर भी चिंता व्यक्त की. SC ने कहा, राज्यपाल सिर्फ इसलिए विश्वास मत साबित करने को नहीं कह सकते क्योंकि किसी पार्टी के अंदर मतभेद है. पीठ ने कहा, जब तक गठबंधन में संख्या समान है, राज्यपाल का वहां कोई काम नहीं बनता है.
सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को असली शिवसेना के मुद्दे पर सुनवाई हुई. इस दौरान अदालत से कई अहम टिप्पणियां सामने आईं. सुनवाई के दौरान सवाल उठा, क्या एक फैसला ना होता तो शिंदे अभी महाराष्ट्र के सीएम ना होते? क्या महाराष्ट्र में सत्ता के अलट-पलट वाले संकट के बीच राज्यपाल ने अपनी शक्तियों का सही से उपयोग नहीं किया? क्या महाराष्ट्र में सत्ता के सबसे बड़े सियासी संकट के दौरान राज्यपाल की भूमिका चिंतनीय रही? क्या महाराष्ट्र में सत्ता के उलटपलट के दौरान राज्यपाल ने विश्वास मत साबित करने को कहकर गलत किया था? क्या महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे से शिंदे के पास सीएम की कुर्सी जाने के दौरान राज्यपाल ने अपनी शक्ति का प्रयोग सावधानी से नहीं किया?
ये कुछ सवाल हैं जो कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने निकल कर आए. दरअसल महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने उद्धव ठाकरे की शिवसेना के खिलाफ शिंदे गुट की बगावत के बाद विश्वास मत सदन में साबित करने को कहा था. इसी पर सवाल उठ रहे हैं. शिवसेना असली कौन के विवाद में सुप्रीम कोर्ट में चलती सुनवाई के दौरान राज्यपाल रहे कोश्यारी पर बड़ी तल्ख टिप्पणी आई हैं.
राज्यपाल ने ठीक से नहीं किया अपनी शक्तियों का इस्तेमाल!
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ ने महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा है कि राज्यपाल को उस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कहना चाहिए जहां उनके एक्शन से एक खास परिणाम निकले. कोर्ट ने पूछा क्या राज्यपाल सिर्फ इसलिए सरकार गिरा सकते हैं, क्योंकि किसी विधायक ने कहा कि उनके जीवन-संपत्ति को खतरा है? क्या विश्वास मत बुलाने के लिए कोई संवैधानिक संकट था?
'राज्यपाल को पूछना चाहिए था ये सवाल'
सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ की ओर से कहा गया कि किसी सरकार को गिराने में राज्यपाल स्वेच्छा से सहयोगी नहीं हो सकते हैं. राज्यपाल को विश्वास मत बुलाने से पहले खुद से पूछना था कि तीन साल तक सरकार में साथ रहे विधायक अब क्यों अलग हो रहे हैं. अदालत ने कहा, राज्यपाल ने कैसे अंदाजा लगाया कि आगे क्या होने वाला है. राज्यपाल सिर्फ इसलिए विश्वास मत साबित करने को नहीं कह सकते क्योंकि किसी पार्टी के अंदर मतभेद है. पीठ ने कहा, जब तक गठबंधन में संख्या समान है, राज्यपाल का वहां कोई काम नहीं बनता है. गौरतलब है कि राज्यपाल रहे भगत सिंह कोश्यारी तो अब खुद ही पद छोड़ चुके हैं. एकनाथ शिंदे भी मुख्यमंत्री बन चुके हैं. चुनाव आयोग भी शिंदे गुट को असली शिवसेना बताकर सुप्रीम कोर्ट में भी हलफनामा दाखिल कर चुका है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अभी जारी है और फैसला आना बाकी है. सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना पर अधिकार को लेकर फैसला आना अभी बाकी है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तत्कालान राज्यपाल की भूमिका पर चिंता जताते हुए की गईं ये टिप्पणियां काफी अहम हैं.

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