
मध्य प्रदेश में चुनावः क्या बदलाव की बयार के बीच शिवराज चौहान को बचा पाएंगी 'लाडली बहनें'
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मध्य प्रदेश 17 नवंबर को अपना सीएम चुनने के लिए वोट करेगा. भाजपा ने शिवराज सिंह चौहान को अपना सीएम फेस घोषित नहीं किया है. हालांकि शिवराज काफी लोकप्रिय हैं और इस मामले में कमलनाथ से आगे हैं. फिर भी इस चुनाव में कई ऐसे फैक्टर हैं जो परिणाम को बदल सकते हैं.
पांच राज्यों में जारी विधानसभा चुनावों के बीच मध्य प्रदेश 17 नवंबर को अपने विधायकों और सीएम को चुनने के लिए वोट करेगा. अभी तक के जो सर्वे सामने आए हैं, उनमें 2018 की तरह ही करीबी मुकाबले की भविष्यवाणी की गई है. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों के बीच सीट-दर-सीट लड़ाई हैं और दोनों ही अपने-अपने स्तर पर विद्रोहों से जूझ रही हैं. इस चुनाव में कई जटिल, परस्पर विरोधी और पैरलल फैक्टर काम कर रहे हैं. कुछ मतदाता जो बदल सकते हैं चुनाव परिणाम सीएसडीएस सर्वेक्षण के अनुसार, शिवराज सिंह चौहान सरकार के साथ जनता का satisfaction level 61 प्रतिशत बेहतर है, 27 प्रतिशत लोग पूरी तरह से संतुष्ट हैं और 34 प्रतिशत कुछ हद तक संतुष्ट हैं. हालाँकि मध्यप्रदेश में यह स्तर छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के 79 प्रतिशत और राजस्थान में अशोक गहलोत के 71 प्रतिशत satisfaction level से कम है. कुछ हद तक संतुष्ट मतदाता किसी भी दिशा में जा सकते हैं और परिणाम को बदल सकते हैं.
कमलनाथ को नहीं माना जाता है जननेता भाजपा ने शिवराज सिंह चौहान को अपना सीएम फेस घोषित नहीं किया है. आख़िरकार, वह 16 वर्षों से अधिक समय से इस पद पर हैं. हालाँकि, कोई दूसरा नेता नहीं है जो उनके करिश्मे की बराबरी कर सके. वह अभी भी लोकप्रिय हैं और अधिकांश सर्वेक्षणों में पसंदीदा सीएम रेटिंग में मामूली रूप से आगे हैं. दूसरी ओर उनके प्रतिद्वंद्वी कमल नाथ को जननेता नहीं माना जाता है. यह ध्यान देने वाली बात है कि सर्वेक्षणों में पसंदीदा सीएम का सवाल जब किया जाता है तो मौजूदा सीएम को टॉप-ऑफ-द-माइंड रिकॉल के कारण अनुचित लाभ मिलता है. उनके किसी भी प्रतिद्वंद्वी, वीडी शर्मा, नरोत्तम मिश्रा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद पटेल आदि की राज्यव्यापी उपस्थिति नहीं है. दूसरी सूची के बाद टिकट बांटने में भी शिवराज की ही चली, पार्टी आलाकमान भी एक तरह से इस बात को स्वीकार कर रहा है.
चर्चा में है 'परिवर्तन' की बात प्रदेश भर में यात्रा, परिवर्तन और बदलाव का जिक्र लगातार चर्चाओं में होता रहता है. कांग्रेस पार्टी का 2018 का नारा, "वक्त है बदलाव का", मतदाताओं को पसंद आया. हालाँकि, परिवर्तन का यहां एक अजीब संदर्भ है. सवाल है कि क्या यह बदलाव सीएम लेवल पर है या फिर सरकारी स्तर पर?
कुछ कट्टर बीजेपी समर्थक हैं जो सीएम में बदलाव देखना चाहते हैं. शिवराज को सीएम चेहरा घोषित न करके, बीजेपी ने मतदाताओं के इस वर्ग की भावनाओं को शांत करने की कोशिश की है. मतदाताओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो सरकार में बदलाव देखना चाहता है और कमल नाथ को एक और मौका देना चाहता है. कांग्रेस को मतदाताओं के एक वर्ग के बीच सहानुभूति कारक से भी फायदा हो रहा है क्योंकि, उन्हें लगता है कि सिंधिया प्रकरण उचित नहीं था.फैक्टर, जो बन सकते हैं बीजेपी के लिए परेशानी का सबब सर्वेक्षणों के अनुसार बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि और गरीबी प्रदेश में तीन बड़े मुद्दों में से एक हैं. आर्थिक और कृषि संकट सामने हैं, और इसे भुनाने के लिए, कांग्रेस ने महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को नकद सहायता, छात्रों को वजीफा, कृषि ऋण माफी और अन्य गारंटी के साथ सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडर देने का वादा किया है.
मध्य प्रदेश में देश में सबसे कम बेरोजगारी दर और मुद्रास्फीति है. इसके बावजूद ये मुद्दे शीर्ष पर हैं. इसका या तो मतलब यह है कि भाजपा मतदाताओं तक इसे प्रभावी ढंग से नहीं पहुंचा पाई है, या सीपीआई/बेरोजगारी दर संकेतक जमीन पर स्थिति को पकड़ नहीं पाते हैं.
टिकट वितरण और जातिगत समीकरण कांग्रेस और भाजपा ने अपने टिकट वितरण में जातिगत समीकरणों का प्रयोग नहीं किया है. दोनों पार्टियों ने सामान्य वर्ग को 35 फीसदी (उनकी आबादी से लगभग दोगुना), ओबीसी को 28-30 फीसदी (जनसंख्या 50 फीसदी से काफी कम), अनुसूचित जाति को 15 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए 20-21 फीसदी को टिकट दिया है.

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