
पहाड़ों पर रहने वाले शेरपाओं का G-20 से क्या है कनेक्शन, कितने मजबूत और काबिल होते हैं ये?
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भारत पहली बार G-20 की मेजबानी कर रहा है. ऐसे में जाहिर है कि इसकी तैयारियां भी उतनी ही खास होंगी. दुनियाभर से आ रहे मेहमान संतुष्ट होकर लौटें और भारत हर मामले में अपना पक्ष रख सके, इसके लिए शेरपा तैनात हुए हैं. जैसे पहाड़ों पर शेरपा ही पर्वतारोही को ऊपर पहुंचाते हैं, वैसे ही कूटनीति के जानकार ये शेरपा कई बड़े मोर्चे संभालेंगे.
भारत के जी-20 शेरपा अमिताभ कांत हैं. नीति आयोग के पूर्व सीईओ केरल कैडर के आईएएस रह चुके हैं. कोविड-19 के दौरान भी अमिताभ कांत एंपावर्ड ग्रुप 3 का हिस्सा रहे. इससे पहले केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को शेरपा का जिम्मा मिला हुआ था, लेकिन उनके पास सेंटर से जुड़े दूसरे काम होने की वजह से अमिताभ कांत को शेरपा बनाया गया. इस पोस्ट पर वही लोग होते हैं, जिनकी राजनैतिक और कूटनीति की समझ काफी गहरी हो.
बैठक के दौरान दो ट्रैक काम करेंगे. एक वित्त ट्रैक है, जिसे RBI के गर्वनर लीड करेंगे. ये सीधे-सीधे फाइनेंस पर काम करता है. दूसरी तरफ शेरपा ट्रैक ज्यादा पेचीदा है. इसमें देशों के आपसी मुद्दों पर बात होती है. साथ ही अलग-अलग वर्किंग ग्रुप्स के बीच तालमेल बिठाने का काम भी शेरपा के जिम्मे आता है. यहां बता दें कि समिट के लिए 13 वर्किंग ग्रुप बने हुए हैं- एनर्जी, ट्रेड-इनवेस्टमेंट, डेवलपमेंट, एम्प्लॉयमेंट, टूरिज्म, एग्रीकल्चर, डिजिटल इकनॉमी, हेल्थ, एजुकेशन, कल्चर, एनवायरमेंट और एंटी-करप्शन. शेरपा ट्रैक इन मुद्दों पर बात करेगा.
डिप्लोमेसी में शेरपा शब्द का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता आया है. कूटनीति के माहिर लोगों को शेरपा कहा जाता रहा. लेकिन असल शेरपा कोई और ही हैं. ये हिमालय की वादियों में बसते हैं, खासकर नेपाल और तिब्बत के इलाके में. शेरपा एक एथनिक समूह है, जिसे उनके एथलीट जीन के लिए जाना जाता है. ये ऊंची जगहों पर, जहां ऑक्सीजन की कमी होती है, वहां भी पहुंच जाते हैं.
विज्ञान के मुताबिक अगर एक औसत पर्वतारोही समुद्र से 8 हजार फीट की ऊंचाई पर जाता है तो ऑक्सीजन का गंभीर संकट होने लगता है. ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है और कई बार ब्रेन के पास सूजन आ जाती है, जो जानलेवा है. दूसरी तरफ शेरपा सी-लेवल से 14 हजार फीट की ऊंचाई पर बिना ऑक्सीजन मास्क के रह जाते हैं. ये वो हाइट है, जहां ऑक्सीजन 40 प्रतिशत तक कम हो जाती है.
क्यों होता है ऐसा इसकी वजह है उनका सुपर-एथलीट जीन. साल 2010 में ये पाया गया कि तिब्बत में रहने वालों के भीतर ऐसे कई जीन होते हैं, जो हाई एल्टीट्यूट पर कम ऑक्सीजन में रहने में मदद करते हैं. उनमें EPAS1 जीन पाया जाता है, जो शरीर में हीमोग्लोबिन के बनने पर कंट्रोल करता है. यही जीन लंग्स को इतनी ताकत देता है कि वो ऊंचाई पर जाकर भी काम कर सके. ये रिसर्च 2 जुलाई 2010 के साइंस जर्नल में छपी थी. ये बदलाव कब हुआ होगा, इसका सही अंदाजा नहीं लगाया जा सका. क्या दुनिया की दूसरी जगहों पर भी ऊंचे स्थानों पर बसी आबादी में ये चेंज दिखता है, इसपर भी कोई स्टडी नहीं मिलती है.
कहां रहते हैं ये लोग ज्यादातर शेरपा नेपाल के पूर्वी हिस्से और तिब्बत के टिंगरी काउंटी में रहते हैं. कुछ लोग नेपाल के काठमांडू में भी बसे हुए हैं. काफी दशक पहले शेरपाओं के कुछ परिवार भारत के सिक्किम और दार्जिलिंग में भी आ बसे थे, जिनकी आबादी अब बढ़ चुकी है. ये लोग तिब्बत और बर्मा की मिली-जुली भाषा बोलते हैं.

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