
नोटों पर भी दस्तखत... ऐसे पहले PM थे मनमोहन, देश के जेहन में रहेंगी अपने महान सपूत की यादें
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मनमोहन सिंह शख्सियत में जितने सहज सरल और नम्र थे, मन से उतने ही मजबूत थे. हिंदुस्तान के मुस्तकबिल की खातिर एक बार मनमोहन सिंह ने अपनी चार साल पुरानी सत्ता और सरकार को भी दांव पर लगा दिया था
डॉक्टर मनमोहन सिंह नहीं रहे. अब उनकी स्मृतियां शेष रह गई हैं. भारत ने एक ऐसा सपूत खो दिया है जो सदियों में एक बार जन्म लेते हैं. डॉक्टर मनमोहन सिंह को आज देश सिर्फ बतौर पूर्व प्रधानमंत्री याद नहीं कर रहा. देशवासियों के सामने पिछले चार-पांच दशक की वो पूरी कहानी रील की तरह घूम रही है...जिसमें डॉक्टर मनमोहन सिंह का काम, राष्ट्र के लिए उनका योगदान, उनका सरल, सहज और कर्मठ व्यक्तित्व लोगों को याद आ रहा है.
रिज़र्व बैंक के गवर्नर से भारत के वित्त मंत्री तक और वित्त मंत्री से प्रधानमंत्री तक इन्हीं तीन तस्वीरों से जुड़ी मनमोहन सिंह की यादें करोड़ों हिंदुस्तानियों के दिलों में हैं.जो आज राष्ट्र के प्रति उनके योगदानों को याद करते हुए श्रद्धा के दो पुष्प अर्पित करना चाहते हैं.
तीन पीढ़ियों के जेहन में डॉ. सिंह हिंदुस्तान की तीन पीढ़ियों के ज़ेहन में डॉक्टर मनमोहन सिंह के तीन अक्स हैं.आम हिंदुस्तानी से उनका परिचय नोटों पर दस्तखत की शक्ल में हुआ था. जब हर हिंदुस्तानी की जेब में पड़े करेंसी नोट पर उनके दस्तखत हुआ करते थे . फिर वो दौर आया जब मनमोहन आर्थिक उदारीकरण के शिल्पकार के तौर पर हिंदुस्तानियों की यादों में बस गए. और फिर एक दौर वो भी आया जब मुल्क की सबसे बड़ी कुर्सी पर रहते हुए सूचना के अधिकार से लेकर रोज़गार के अधिकार तक और डीबीटी से आधार तक...जैसे देश की तस्वीर और देशवासियों की तकदीर बदलने वाले फैसले उनकी दस्तखतों से हुए.
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डॉक्टर मनमोहन सिंह आज अगर देशवासियों की यादों में बसे हैं तो उसकी एक बड़ी वजह उनकी शख्सियत है. वह सहज, सरल, विनम्र तो वे थे ही. उनकी शख्सियत का सबसे मजबूत पहलू थी कर्मठता. ऐसा कर्मयोगी जिन्होंने अपने जीवन पथ में दिए गए हर दायित्व को यज्ञ समझकर पूरा किया.
पहले कार्यकाल में बनाए मजबूत कानून 21वीं सदी के हिंदुस्तान में मनमोहन सिंह ने मुल्क की बागडोर ऐसे नाजुक हालात में संभाली थी जब देश की सियासत सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने और नहीं बनने देने के मुद्दे पर करवट ले रही थी. सोनिया गांधी की ओर से दी गई उस जिम्मेदारी को डॉ मनमोहन सिंह ने पूरी ईमानदारी और कर्मठता से निभाया. अपनी पहली पारी में ही डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार ने गठबंधन की सरकार की तमाम मजबूरियों और दबावों के बावजूद देश के गांव गरीब मजदूर किसान के कल्याण की दिशा में काम किये. सरकार में आने के पहले ही साल में मनमोहन सिंह ने मनरेगा जैसा कानून बनाया.

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