
नीतीश कुमार का NDA में जाना राहुल गांधी का अपने हिस्से की ताकत मोदी को सौंपने जैसा
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नीतीश कुमार शुरू से ही बीजेपी और लालू परिवार से बारी बारी फायदा उठाते, और पहुंचाते रहे हैं. 2024 के आम चुनाव में वो गांधी परिवार के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद हो सकते थे. राहुल गांधी ने नीतीश कुमार को सिर्फ गंवाया ही नहीं है, पूरे होशो-हवास में वो ताकत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के हवाले कर दिया है.
राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के साथ बिहार में भी पश्चिम बंगाल की तरह ही दाखिला ले रहे हैं. किशनगंज को बिहार में कांग्रेस का गढ़ माना जाता है. 2009 से ही किशनगंज सीट कांग्रेस के पास है. 2014 ही नहीं, 2019 में भी जब बिहार में एनडीए ने 40 में से 39 सीटें जीत ली थी मुस्लिम आबादी वाले इलाके किशनगंज की सीट कांग्रेस अपने पास रखने में सफल रही - और लालू यादव की पार्टी आरजेडी का खाता भी नहीं खुल सका था.
अगर नीतीश कुमार की नाराजगी इस हद तक नहीं पहुंची होती कि वो महागठबंधन छोड़ कर एनडीए के मुख्यमंत्री बन जाते, तो जेडीयू नेता और कार्यकर्ता भी इस बार राहुल गांधी के साथ यात्रा में देखने को मिल सकते थे, बशर्ते न्याय यात्रा कांग्रेस नहीं बल्कि INDIA ब्लॉक के बैनर तले निकाली गई होती. कांग्रेस के अकेले अकेले न्याय यात्रा निकालने पर जेडीयू नेता पहले भी बहुत कुछ बोल चुके हैं, और अब भी वही बातें दोहरा रहे हैं.
जेडीयू ने INDIA ब्लॉक से अलग होने को लेकर आरजेडी से ज्यादा कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है. बेशक नीतीश कुमार का फिर से एनडीए में लौट जाना लालू यादव और तेजस्वी यादव के लिए बहुत बड़ा झटका है, लेकिन ये तो सिर्फ बिहार की बात है, राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए तो पूरे देश में नुकसान ही नुकसान है.
कांग्रेस नेतृत्व से नीतीश की नाराजगी क्यों?
नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले NDA और महागठबंधन की तुलना करते हुए नीतीश कुमार समझा रहे थे कि पहले के गठबंधन को छोड़कर नया गठबंधन बनाया था, लेकिन हालात ठीक नहीं लगे... जिस तरह के दावे और बयानबाजी हो रही थी, जेडीयू के नेताओं को खराब लगा रहा था... इसलिए वो इस्तीफा देकर अलग हो गये.
नीतीश कुमार की बातों को जेडीयू नेता केसी त्यागी अपने तरीके से समझा रहे हैं. ये नीतीश कुमार ही हैं, जिन्होंने विपक्षी दलों के नेताओं के बीच कांग्रेस की स्वीकार्यता बनाने की कोशिश की. बात भी सही है, अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी को कांग्रेस के साथ आने के लिए मना लेना आसान नहीं था.

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