
दुख, अकेलापन और विलाप... वायनाड के राहत शिविरों में पसरी कलेजा चीर देने वाली शांति
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वे लोग जिनसे वो प्यार जताया करते थे और जो आंखों के तारे थे वह या तो अब तक लापता हैं या फिर उस रोज आए भूस्खलन की भेंट चढ़ गए. उनकी गाढ़ी कमाई अब मलबों के नीचे दबकर मलबा ही हो चुकी है. ये अंदाजा लगा पाना कठिन है कि उन लोगों के लिए उस काली रात की सुबह कैसी रही होगी, जिन्होंने उस दिन का सूरज अपने जीवन में छा गए गहरे अंधकार में देखा.
केरल के वायनाड में मेप्पादी के राहत शिविरों में उदासी छायी हुई है. यहां जिस तरह की शांति पसरी हुई है, वह कलेजा चीर देने वाली है और ये शांति तब और डरावनी हो जाती जब इस माहौल को उन लोगों की सिसकियां और करुण चीखें भंग कर देती हैं, जिन्होंने बीते मंगलवार को इस क्षेत्र में हुए विनाशकारी भूस्खलन में अपना सब कुछ खो दिया था. जो बच गए हैं, वह अभी भी इस बात की कल्पना नहीं कर पा रहे हैं कि वह ऐसे भीषण हादसे से गुजर चुके हैं, जिसने उनसे उनका सब कुछ छीन लिया है. सब कुछ यानी, घर-परिवार और रिश्ते.
मलबों में दब गए रिश्ते और गाढ़ी कमाई वे लोग जिनसे वो प्यार जताया करते थे और जो आंखों के तारे थे वह या तो अब तक लापता हैं या फिर उस रोज आए भूस्खलन की भेंट चढ़ गए. उनकी गाढ़ी कमाई अब मलबों के नीचे दबकर मलबा ही हो चुकी है. ये अंदाजा लगा पाना कठिन है कि उन लोगों के लिए उस काली रात की सुबह कैसी रही होगी, जिन्होंने उस दिन का सूरज अपने जीवन में छा गए गहरे अंधकार में देखा. शिविरों में रह रहे ये पीड़ित अभी भी नहीं मान पा रहे हैं कि अब यही दुख उनका जीवन है, और इसकी कोई भरपायी नहीं हो सकती है.
जो शरीर पर है, कपड़ों के नाम पर बस वही बचा वह लोग अब भाव से शून्य हैं और आंखें किसी उम्मीद से परे हैं. वह अगर कुछ देख भी पा रही हैं तो सिर्फ अपना अनिश्चित भविष्य. एक जीवित बचे व्यक्ति ने रोते हुए कहा, "मुझे नहीं पता कि क्या करना है. हमारे पास जो कुछ भी था वह सब हमने खो दिया. हमारे पास बस वही है जो हमने अभी पहना है."
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