
तल्खी भी...तरफदारी भी, दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के बीच अजब-गजब रही है सियासी केमिस्ट्री
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मध्य प्रदेश की सियासत में दिग्विजय और कमलनाथ के बीच की केमिस्ट्री को लेकर बहस छिड़ी है. कमलनाथ के कुर्ते फाड़ने वाले बयान को लेकर शुरू हुई बहस के बीच चर्चा उनकी दिग्विजय के साथ केमिस्ट्री को लेकर भी चर्चा हो रही है. मध्य प्रदेश के दो दिग्गजों के बीच केमिस्ट्री कैसी रही है?
मध्य प्रदेश चुनाव के दौरान एक वीडियो सामने आया. इस वीडियो में मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ टिकट नहीं मिलने से नाराज नेता के समर्थकों से कह रहे थे- जाकर दिग्विजय सिंह और उनके बेटे के कपड़े फाड़ो. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने भी ये वीडियो एक्स (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर दिया. चुनावी मौसम में सामने आया ये वीडियो तेजी से वायरल हो गया और सूबे की सियासत में सियासी बवाल हो गया. हंगामा खड़ा हुआ तो कांग्रेस का वचन पत्र जारी करते हुए कमलनाथ ने इसे लेकर सफाई भी दी.
दिग्विजय सिंह के साथ उनकी नोकझोंक भी खबरों में रही, खूब सुर्खियां बनीं. मध्य प्रदेश चुनाव के लिए वचन पत्र जारी करने के कार्यक्रम में दोनों नेताओं की तल्खी भी नजर आई. कमलनाथ ने ये भी कहा कि गाली खाने के लिए उन्होंने दिग्विजय सिंह को पावर ऑफ अटॉर्नी दी हुई है. वहीं, दिग्विजय ने कहा कि विष पीने को भी तैयार हूं. हालांकि, दिग्विजय ने कमलनाथ से ये सवाल जरूर पूछ लिया कि फॉर्म ए और बी पर किसके दस्तखत होते हैं. ये सब हुए चार दिन बीत चुके हैं लेकिन इसे लेकर चर्चा थम नहीं रही.
चर्चा के केंद्र में सवाल एक- कि क्या कमलनाथ और दिग्विजय के बीच सब ठीक है? दोनों ही नेता कई मौकों पर ये कह चुके हैं कि उनके बीच सियासी से अधिक पारिवारिक रिश्ते हैं. दिग्विजय सिंह, कमलनाथ से तनाव की खबरों पर कई बार ये कह चुके हैं कि हमारी दोस्ती में कोई दरार नहीं आएगी. अब कहा ये भी जाता है कि सियासत में कोई किसी का सगा नहीं होता. समय-समय पर ये दिखा भी है. लेकिन दिग्विजय के दावे को आसानी से खारिज कर देना भी मुश्किल है.
दरअसल, कमलनाथ और दिग्विजय की केमिस्ट्री भी बहुत अजब-गजब रही है. दोनों नेताओं के रिश्तों में तल्खी रही है तो तरफदारी भी. दिग्विजय सिंह ने जहां साल 1971 में राघौगढ़ नगरपालिका के अध्यक्ष का चुनाव लड़कर सियासत में कदम रखा और 1977 में राघौगढ़ से पहली बार विधानसभा पहुंचे. वहीं, कमलनाथ के सियासी सफर का आगाज साल 1980 में छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने से हुआ. कमलनाथ जब पहली बार चुनाव लड़ रहे थे, दिग्विजय सिंह दूसरी बार विधानसभा पहुंचने की जुगत में थे.
कमलनाथ के सहयोग से ही CM बने थे दिग्विजय
कमलनाथ दिल्ली तो दिग्विजय मध्य प्रदेश की सियासत में पैर जमाते चले गए. साल 1993 के चुनाव में कांग्रेस बहुमत के साथ सत्ता में आई. तब केंद्र में पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार थी. चुनाव नतीजों के बाद ये मंथन चल रहा था कि मुख्यमंत्री की कुर्सी किसे दी जाए. पार्टी पर नरसिम्हाराव की ही पकड़ मजबूत थी. तब मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की रेस में तीन नाम थे- माधवराव सिंधिया, श्यामाचरण शुक्ल और दिग्विजय सिंह. सिंधिया ने श्यामाचरण का समर्थन कर दिया जिसके बाद दो ही दावेदार बचे.

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