
डोनाल्ड ट्रंप ने 12 बार जीत का ऐलान किया, फिर भी मांगे तीन और हफ्ते... क्या हासिल करना चाहता है अमेरिका?
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Trump Iran war strategy analysis: ईरान के साथ जारी युद्ध में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बार-बार जीत के दावे पर सवाल उठ रहे हैं. एक महीने में 12 बार जीत का दावा करने के बावजूद उन्होंने अब 3 और हफ्तों की जरूरत बताई है. इस बीच युद्ध का असर अमेरिका में पेट्रोल की बढ़ती कीमतों और गिरती लोकप्रियता के रूप में दिख रहा है. विशेषज्ञ इसे 2003 के ‘मिशन पूरा हुआ’ जैसे जोखिम से जोड़कर देख रहे हैं.
साल 2003 की बात है. अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश एक एयरक्राफ्ट कैरियर पर खड़े होकर पूरी दुनिया को बता रहे थे कि इराक की जंग जीत ली गई. उनके पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, "मिशन पूरा हुआ" यानी काम पूरा हो गया. लेकिन असलियत यह थी कि वह जंग अभी शुरू हुई थी. इराक अगले नौ साल तक खून और आग में जलता रहा. हजारों अमेरिकी सैनिक मारे गए. और 2011 में अमेरिका को एक तबाह देश छोड़कर वापस आना पड़ा. अब 2026 में इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता दिख रहा है. बस फर्क इतना है कि इस बार इराक की जगह ईरान है और बुश की जगह डोनाल्ड ट्रंप.12 बार जीत का ऐलान, फिर भी तीन हफ्ते और चाहिए 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर बड़ा हमला बोला था. एक महीने से ज्यादा हो गया है. इस दौरान ट्रंप ने सात अलग-अलग भाषणों में 12 बार कहा कि जंग जीत ली. लेकिन फिर बुधवार को उन्होंने पूरी दुनिया के सामने माना कि तीन और हफ्ते चाहिए. यानी एक तरफ जीत का ढोल और दूसरी तरफ तीन हफ्ते और मांग रहे हैं. यह बात खुद में बहुत कुछ बता देती है.सवाल यह है कि जो एक महीने में नहीं हुआ वो तीन हफ्ते में कैसे होगा? अमेरिका को क्या-क्या नुकसान हुआ? पेंटागन और खुद ट्रंप ने माना है कि अब तक कम से कम 13 अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं और करीब 350 घायल हुए हैं. कुछ रिपोर्ट्स में यह संख्या 15 मौतों तक बताई गई है. सिर्फ जानें ही नहीं, पैसा भी बहुत गया है. तुर्की की न्यूज एजेंसी अनादोलू की रिपोर्ट के मुताबिक पहले एक महीने में ईरान के मिसाइलों और ड्रोन ने अमेरिका के 1.4 अरब डॉलर से लेकर 2.9 अरब डॉलर तक के हथियार और इक्विपमेंट तबाह कर दिए. अमेरिका के F-15E लड़ाकू विमान दोस्ताना आग यानी अपनों की ही गोली से गिरे. एक F-35 को इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी. पश्चिम एशिया में कई अमेरिकी अड्डों पर ईरान के जवाबी हमले हुए. यह जंग जो कुछ हफ्तों में खत्म होनी थी वो अब लंबे समय तक चलने वाली लड़ाई बन गई है. और यही वो जाल है जिसमें फंसने की कसम ट्रंप ने कभी खाई थी.
यह भी पढ़ें: पेजेशकियान की चिट्ठी में छुपा है US-ईरान के बीच सुलह का रास्ता! बस ट्रंप का Ego रास्ते में न आएघर में आग लग रही है - पेट्रोल चार डॉलर के पार जंग के मैदान से भी बड़ी मुसीबत ट्रंप के घर यानी अमेरिका में है. पेट्रोल की कीमत चार साल में पहली बार चार डॉलर प्रति गैलन के पार चली गई है. जब से ईरान पर हमला शुरू हुआ तब से यह एक डॉलर से ज्यादा बढ़ चुकी है. होर्मुज की खाड़ी जो दुनिया के सबसे बड़े तेल रास्तों में से एक है वहां ईरान की नाकेबंदी और हमलों से दुनियाभर में तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है. इसका सीधा असर आम अमेरिकी पर पड़ रहा है. सीएनएन और एनबीसी की रिपोर्ट्स कहती हैं कि ट्रक चालक अपने ट्रक खड़े कर रहे हैं क्योंकि डीजल बहुत महंगा हो गया है. परिवार किराने का सामान कम खरीद रहे हैं. छोटे कारोबार अपने ग्राहकों पर बढ़ी हुई लागत का बोझ डाल रहे हैं. व्हाइट हाउस कह रहा है कि यह दर्द परमानेंट नहीं है. लेकिन हर हफ्ते गाड़ी में पेट्रोल भरवाने वाले करोड़ों अमेरिकियों के लिए यह सफाई खोखली लगती है.ट्रंप की लोकप्रियता डूब रही है सीएनएन और यू-गव-इकोनॉमिस्ट के ताजा सर्वे में ट्रंप की मंजूरी दर सिर्फ 35 फीसदी रह गई है. यह उनके पूर्ववर्ती जो बाइडन के सबसे बुरे दौर से भी नीचे है. याद रहे कि ट्रंप ने खुद बाइडन को "क्रुक्ड जो" और "स्लीपी जो" कहकर खूब चिढ़ाया था. कुछ सर्वे तो ट्रंप का नेट अप्रूवल माइनस 23 पॉइंट बता रहे हैं जो उनका अब तक का सबसे बुरा आंकड़ा है. यहां तक कि उनके कट्टर समर्थक MAGA गुट के कुछ लोग भी अब सवाल उठा रहे हैं. वे कह रहे हैं कि ट्रंप ने "कोई नई जंग नहीं" और "अमेरिका पहले" के वादे तोड़ दिए. रिपब्लिकन पार्टी की आंतरिक पोलिंग की रिपोर्ट रॉयटर्स के हवाले से कई जगह छपी है जिसमें कहा गया है कि अगर गर्मियों तक जंग जारी रही और कोई साफ जीत नहीं दिखी तो अगले मिडटर्म चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान हो सकता है.तो तीन हफ्तों में ट्रंप क्या करना चाहते हैं? ट्रंप के करीबी अधिकारी निजी बातचीत में तीन बातें कहते हैं. पहला ईरान के बचे हुए मिसाइल भंडार को तबाह करना. दूसरा होर्मुज की खाड़ी खुलवाना. तीसरा ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड के कमांड सेंटर पर आखिरी बड़ा वार करना. लेकिन असली बात यह है कि ट्रंप एक छोटी सी जीत को बड़ी जीत के रूप में दिखाना चाहते हैं. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ट्रंप के भाषण के बाद X पर लिखा कि लक्ष्य हैं - ईरान के हथियार कारखाने तबाह करना, उसकी नौसेना और वायुसेना बर्बाद करना और उसे परमाणु हथियार बनाने से हमेशा के लिए रोकना.यूरेनियम चुराने की योजना? सबसे दिलचस्प और खतरनाक विकल्प जो चर्चा में है वो यह है कि अमेरिका ईरान के जमीन के नीचे बंकरों में छापा मारकर वहां रखा बड़ी मात्रा में समृद्ध यूरेनियम निकाल ले आए. डिफेंस प्रायोरिटीज की सैन्य विशेषज्ञ जेनिफर कावनाग ने ऑस्ट्रेलियन फाइनेंशियल रिव्यू को बताया कि यही शायद वो वजह है जिसके लिए पश्चिम एशिया में अमेरिकी सेना की भारी तैनाती हो रही है.
यह भी पढ़ें: ग्राउंड रिपोर्ट: LPG संकट के बीच दिल्ली-मुंबई और गुजरात से लौट रहे कामगार, घर वापसी पर छलका दर्द उनके मुताबिक ट्रंप यूरेनियम निकालकर दुनिया को बता सकते हैं कि उन्होंने ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोक दिया और फिर जंग खत्म करके वापस आ सकते हैं. लेकिन यह जितना देखने में अच्छा लगता है उतना ही खतरनाक भी है. ट्रंप के दौर में ही रक्षा मंत्री के वरिष्ठ सलाहकार रहे कर्नल डगलस मैकग्रेगर ने कहा है कि जमीनी हमले की योजना बेहद जोखिम भरी है और ट्रंप प्रशासन की सोच में कमजोरी दिखाती है. नाटो के पूर्व सुप्रीम कमांडर एडमिरल जेम्स स्टेवरिडिस ने यूरेनियम निकालने की योजना को "बड़े जोखिम के बदले बहुत कम फायदा" बताया है. और अगर यूरेनियम निकाल भी लिया गया तो क्या ईरान परमाणु हथियार बनाना बंद कर देगा? विशेषज्ञ कहते हैं कि अब और भी कट्टर हो चुका ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखेगा.क्या यह 2003 दोहराया जा रहा है? तस्वीर साफ है. ट्रंप के तीन हफ्ते दरअसल एक जीत का भाषण तैयार करने का वक्त है. ठीक वैसे ही जैसे बुश ने 2003 में "मिशन पूरा हुआ" का बैनर टांगकर जीत का ऐलान किया था जबकि असली जंग तो बस शुरू हुई थी. ईरान की जंग में अभी तेल और पानी के कारखाने बचे हुए हैं. बाकी सब तबाह करने के बाद भी ट्रंप के पास दिखाने के लिए कुछ खास नहीं है. इसलिए या तो कहीं झंडा गाड़ना है या यूरेनियम उठाकर लाना है. दोनों के लिए जमीन पर सैनिक उतारने होंगे. और जमीनी जंग का मतलब है और ज्यादा नुकसान, और ज्यादा मौतें, और ज्यादा पैसा. पश्चिम एशिया में 28 फरवरी से पहले जितना अस्थिर था उससे कहीं ज्यादा अस्थिर आज है. मौतें बढ़ रही हैं. पेट्रोल महंगा है. और ट्रंप की घड़ी तेज टिक-टिक कर रही है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार रात राष्ट्र को संबोधित करते हुए ईरान के खिलाफ जंग जारी रखने का साफ संकेत दिया है. ट्रंप ने इसे 'थोड़े दर्द के बाद बड़े लाभ' की रणनीति बताया है. विशेषज्ञों का मानना है कि ये भाषण घरेलू जनता को शांत करने और आगामी हफ्तों में निर्णायक सैन्य कार्रवाई की जमीन तैयार करने के लिए था.

अमेरिका और ईरान के बीच छिड़े युद्ध को एक महीना हो चुका है. एक ऐसा युद्ध, जो अमेरिका के अलावा दुनिया में कोई नहीं चाहता था. लेकिन अब तबाही का दायरा और बढ़ गया है. यमन के हूती बागियों ने इजरायल पर मिसाइलें दाग दी हैं. और सबसे खतरनाक बात ये है कि ये बागी दुनिया की सबसे बड़ी तेल लाइफलाइन यानी 'बाब अल-मंदेब' (Bab al-Mandab) के मुहाने पर बैठे हैं. देखें कूटनीति.

Donald Trump Full Speech: ईरान-अमेरिका-इज़रायल के बीच जारी संघर्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र के नाम संबोधन दिया. 19 मिनट के भाषण में ट्रंप ने दावा किया कि ईरान में जारी ऑपरेशन को लेकर अपडेट दिया. अपने संबोधन में ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा,

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में दावा किया कि अमेरिका ने ईरान में बड़ी सैन्य सफलता हासिल की है. उन्होंने कहा कि ईरान की सेना, नौसेना और वायुसेना को भारी नुकसान हुआ है और मिसाइल क्षमता कमजोर हुई है. ट्रंप के मुताबिक, युद्ध अपने अंतिम चरण में है और अमेरिका अपने लक्ष्य लगभग हासिल कर चुका है.

सैन डिएगो की क्लब डांसर चार्म डेज ने दावा किया है कि युवा अमेरिकी सैनिक अपनी आने वाली तैनाती के बारे में बेझिझक जानकारी दे रहे हैं. ये क्लब नेवल बेस सैन डिएगो और कैंप पेंडलेटन जैसे बड़े मिलिट्री बेस के पास है. हालांकि, डेज ने किसी विशेष यूनिट या मिशन की जानकारी साझा नहीं की, लेकिन उसके दावों को अमेरिका की संभावित बड़ी सैन्य तैयारी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.

आज सबसे पहले हम आपको बताएंगे कि ईरान-अमेरिका युद्ध में आज की रात भयानक कैसे हो सकती है? पूरी आशंका है कि आज अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया को बहुत बड़ा सरप्राइज दे सकते हैं. या फिर ईरान पूरी दुनिया को चौंका सकता है. इस समय ट्रंप की उंगली सरप्राइज बटन पर है, वो अभी तक अपने बयानों से लोगों को चौंका रहे हैं. हर बार उनका नया बयान लोगों के लिए एक सरप्राइज ही साबित हो रहा है. कभी वो कहते हैं कि उन्होंने ईरान को तबाह कर दिया है. कभी वो कहते हैं कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पूरी तरह खुला है. कभी वो कहते हैं कि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज नहीं खोला तो ईरान को पाषाण युग में भेज देंगे. कभी वो कहते हैं कि ईरान से अच्छी बातचीत चल रही है, फिर वो कहते हैं कि ईरान सीजफायर के लिए गिड़गिड़ा रहा है. फिर अचानक से कहते हैं कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खुले या बंद रहे अमेरिका इस युद्ध से बाहर हो जाएगा. एकदम से वो NATO और यूरोप के देशों पर भड़क जाते हैं. और कहते हैं कि NATO किसी काम का नहीं है, अमेरिका इससे अलग होने पर विचार करेगा.

ट्रंप जो पल में तोला, पल में माशा वाले बयान देते आ रहे हैं. सब जानना चाहते हैं कि जल्द ही ईरान से बाहर निकलने की बात करने वाले ट्रंप क्या वाकई युद्ध से बाहर निकलेंगे. वो क्या बोलेंगे. युद्ध खत्म करने को लेकर बोलेंगे? क्या युद्ध जल्द खत्म करने की डेडलाइन देंगे? क्या बताएंगे कि वो युद्ध से किस शर्त पर बाहर निकलेंगे? क्या ट्रंप का बयान उनका झुकना माना जाएगा? क्या ट्रंप ईरान की बात मान लेंगे?

अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस महायुद्ध में फिर दोहराया है कि 'हम बहुत जल्द ईरान से बाहर निकल जाएंगे,' लेकिन ट्रंप ने समय-सीमा नहीं बताई है. ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के राष्ट्रपति ने अमेरिका से सीजफायर की मांग की है. ईरान की नई लीडरशिप पहले के मुकाबले कम कट्टर और ज्यादा समझदार है. लेकिन हम तभी विचार करेंगे जब होर्मुज स्ट्रेट सबके लिए खुला रहेगा, वरना हम बड़ा हमला करेंगे. इस बीच ईरान ने फिर दावा किया है कि उसने अमेरिका से किसी तरह की सीजफायर की मांग नहीं की है. चौथी बड़ी खबर ये है कि ईरान के विदेश मंत्री ने साफ कह दिया है कि ईरान छह महीने लड़ने के लिए तैयार हैं. वहीं पांचवीं खबर NATO से जुड़ी हुई है. ट्रंप ने कहा है कि हम नाटो से निकलने के बारे में विचार कर रहे हैं. ट्रंप ने चिढ़ाते हुए कहा है कि नाटो कागजी शेर है.

ईरान ने कल कहा था कि वो खाड़ी देशों में अमेरिकी कंपनियों के ठिकानों पर हमला करेगा. उसने ऐसा करना शुरू भी कर दिया है बहरीन में Amazon के क्लाउड कंप्यूटिंग सेंटर को ईरानी हमले में नुकसान पहुंचा है. ईरान की तरफ से सभी खाड़ी देशों में अमेरिका की 18 बड़ी कंपनियों को निशाना बनाने की धमकी दी थी. इसके जवाब में अमेरिका ने कहा था कि वो तैयार है अमेरिकी कंपनियों के ठिकानों की सुरक्षा करेगा.




