
जातिगत सर्वे पर राहुल गांधी का दांव कांग्रेस के लिए मौत के कुएं जैसा है!
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कांग्रेस ने जातीय राजनीति का लक्ष्य तो 2024 के आम चुनाव के हिसाब से रखा है, लेकिन विधानसभा चुनावों में अभी से आजमा रही है. ऐसे में जबकि सामाजिक न्याय के पैरोकार बने राजनीतिक दल भी सोशल इंजीनियरिंग पर निर्भर हैं, जातीय राजनीति के रास्ते चल कर सत्ता में वापसी की कांग्रेस की रणनीति बहुत जोखिम भरी लगती है.
कांग्रेस ने जातीय राजनीति के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया है. पहले जातिगत जनगणना को लेकर मल्लिकार्जुन खड़गे ने अप्रैल, 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था. उसके बाद संसद में महिला आरक्षण बिल लाये जाने के दौरान सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने महिलाओं के बहाने ओबीसी आरक्षण की मांग रखी. अब CWC में भी कांग्रेस नेताओं ने बैठ कर पूरे इत्मीनान से फैसला कर लिया है कि केंद्र की सत्ता में पार्टी की वापसी हुई तो सरकार जातीय जनगणना कराएगी.
सिर्फ जातिगत जनगणना ही नहीं, CWC में आरक्षण की सीमा बढ़ाने के लिए संसद के जरिये कानून बनाने का भी निर्णय हुआ है. विपक्षी खेमे प्रमुख नेता शरद पवार ने भी आरक्षण की तय की गयी ऊपरी सीमा बढ़ाई जानी चाहिये.
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी की तरह जातिगत जनगणना को लेकर राहुल गांधी भी यही समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि ये हमारी मांग नहीं, बल्कि जिद है. लक्ष्य तो 2024 का आम चुनाव है, लेकिन कांग्रेस मौजूदा विधानसभा चुनावों के लिए भी ये दांव चल चुकी है. जातिगत जनगणना कराने के लिए कांग्रेस बीजेपी पर दबाव भी बना रही है, और ये भी मैसेज देने की कोशिश है कि वो इस मुद्दे पर क्षेत्रीय दलों के साथ खड़ी है, ताकि INDIA अगले आम चुनाव तक कायम रहे.
ओबीसी वोट शेयर के आंकड़े तो कांग्रेस के खिलाफ हैं
राहुल गांधी को लगता है कि बीजेपी के खिलाफ जातिगत जनगणना का दांव अचूक हथियार साबित हो सकता है, क्योंकि मोदी सरकार ने जातिगत जनगणना कराने से इनकार कर दिया है. लेकिन आंकड़े तो यही कह रहे हैं कि बीजेपी के जातिगत जनगणना के खिलाफ खड़े होने के बावजूद ओबीसी वोट उसे भरपूर मिल रहा है.
और बीजेपी का ओबीसी वोट शेयर बढ़ने का मतलब तो यही हुआ कि जातीय राजनीति करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों का वोट शेयर घट रहा है - ऐसे में कांग्रेस को भला कितना फायदा मिल सकता है?

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