
छोटे-बड़े खर्चे रोकने को मजबूर पाकिस्तान, सेना के सालान परेड के आयोजन में होगी कटौती
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पाकिस्तानी रुपये के ऐतिहासिक निचले स्तर, घटते विदेशी मुद्रा भंडार और दशकों से ऊंची मुद्रास्फीति के साथ पाकिस्तान भारी आर्थिक संकट से जूझ रहा है. वित्तीय संकट को देखते हुए, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस साल फरवरी में खर्च को कम करने के लिए संघीय सरकार के स्तर पर बड़े पैमाने पर मितव्ययिता (खर्चा कम करने) अभियान की शुरुआत की है.
आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान को अब अपने छोटे बड़े खर्चों में कटौती करनी पड़ रही है. इसी कड़ी में पाकिस्तानी सेना ने पाकिस्तान दिवस पर सशस्त्र बलों की वार्षिक परेड को सीमित पैमाने पर आयोजित करने का फैसला किया है. ये सरकार की Austerity drive यानी मितव्ययिता (खर्चा कम करने) अभियान में शामिल है जिसका उद्देश्य आर्थिक संकट को दूर करना है.
पाकिस्तान का सैन्य परेड प्रत्येक वर्ष 23 मार्च को मनाया जाता है. यह आयोजन 1940 के लाहौर संकल्प को मनाने के लिए उत्सव के केंद्र में है, जिसमें ब्रिटिश शासित भारत के मुसलमानों के लिए एक स्वतंत्र देश की स्थापना का आह्वान किया गया था. इस दिन को मनाने और देश की सैन्य शक्ति और सांस्कृतिक विविधता के शानदार प्रदर्शन को देखने के लिए हजारों पाकिस्तानी हर साल इस्लामाबाद के शकरपेरियन मैदान में इकट्ठा होते थे.
पाकिस्तानी रुपये के ऐतिहासिक निचले स्तर, घटते विदेशी मुद्रा भंडार और दशकों से ऊंची मुद्रास्फीति के साथ पाकिस्तान भारी आर्थिक संकट से जूझ रहा है. वित्तीय संकट को देखते हुए, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस साल फरवरी में खर्च को कम करने के लिए संघीय सरकार के स्तर पर बड़े पैमाने पर मितव्ययिता (खर्चा कम करने) अभियान की शुरुआत की है. इसमें सालाना 200 अरब रुपये बचाने की महत्वाकांक्षी योजना पर नजर रखी जा रही है.
सूत्रों ने बताया कि देश के सामने आ रही आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए इस साल की सैन्य परेड पारंपरिक स्थल के बजाय राष्ट्रपति भवन में आयोजित की जाएगी. पाकिस्तानी सेना ने लोगों के साथ-साथ कम खर्च की नीति का पालन करने का फैसला किया है. परेड कार्यक्रम को सीमित करने के कदम से लागत में कटौती करने में मदद मिलेगी क्योंकि इसके लिए भारी खर्च की आवश्यकता होती है.
कर्ज की जाल में फंस चुका है पाकिस्तान
पिछले साल श्रीलंका ने खुद को आर्थिक तौर दिवालिया घोषित कर दिया था. अब पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी श्रीलंका से बदतर हो चुकी है. श्रीलंका के दिवालिया होने के पीछे सरकार की नीतियां जिम्मेदार थीं, पाकिस्तान की नीतियां दुनिया में किसी से छिपी नहीं हैं. इन दोनों देशों के राजनेताओं ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, जिससे देश की आर्थिक सेहत इतनी बिगड़ गई. दरअसल, मौजूदा समय में पाकिस्तान में महंगाई चरम पर है, लोगों की आमदनी घट रही है. अगर IMF से 1 बिलियन डॉलर की मदद मिल भी जाती है तो उससे कितने दिन तक खतरा टल जाएगा. पाकिस्तान कर्ज की जाल में फंस चुका है, अब उससे बाहर निकलना आसान नहीं है. लोन को चुकाने के लिए लोन लिया जा रहा है. कुछ इसी तरह सालभर पहले श्रीलंका में चल रहा था.

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