
चुनावी चंदे की लड़ाई नई नहीं... केवल कांग्रेस को चुनावी चंदा मिलने से परेशान अटल लाए थे नेहरू काल में बैन लगवाने के लिए बिल, रोचक किस्सा
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इलेक्टोरल बॉन्ड पॉलिसी और कॉर्पोरेट चंदे को लेकर देशभर में चर्चा हो रही है. बीजेपी जहां इलेक्टोरल बॉन्ड पॉलिसी को सही ठहरा रही है तो विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी ने डरा-धमकाकर ज्यादा चंदा वसूल किया है. हालांकि, इतिहास 1962 का किस्सा दोहरा रहा है. तब विपक्ष में जनसंघ था और सत्ता में कांग्रेस. उस समय अटल बिहारी वाजपेयी ने भी चुनावी चंदे पर सवाल उठाए थे और सत्तारूढ़ दल को ज्यादा चंदा मिलने का तर्क दिया था. सदन में यह प्राइवेट मेंबर बिल खारिज हो गया था.
देश में इलेक्टोरल बॉन्ड चर्चा में है. चुनावी चंदे पर विपक्ष मुखर है. सुप्रीम कोर्ट ने भी पारदर्शिता पर जोर दिया है और इस योजना को ही रद्द कर दिया है. जबकि सरकार का दावा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड पॉलिसी की वजह से ही चंदे की सही जानकारी मिल पा रही है. रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पहली बार चुनावी चंदे पर प्रतिक्रिया दी. पीएम मोदी ने कहा, 2014 से पहले जब चुनाव हुए तो कौन सी एजेंसी बता सकती है कि पैसा कहां से आया और कहां गया? हम चुनावी बॉन्ड लेकर आए, इसलिए आज आप बता पा रहे हैं कि किसने किसको कितना दिया और कैसे दिया, वरना यह पता ही नहीं चल पाता. आइए जानते हैं कि चुनावी चंदे पर 1962 का किस्सा...
हालांकि, ऐसा नहीं है कि चुनावी चंदा पहली बार चर्चा में है. इससे पहले भी चुनावी चंदे को लेकर विवाद रहा है. आंकड़े बताते हैं कि जो पार्टी सत्ता में रही है, उसे सबसे ज्यादा चुनावी चंदा मिला है. जब इलेक्टोरल बॉन्ड नहीं थे, तब भी सत्ता पक्ष ही चंदे पाने के मामले में सबसे आगे रहता था या फिर जिस दल की सत्ता में आने की संभावना सबसे ज्यादा होती थी, उस पर कॉर्पोरेट घराने सबसे ज्यादा मेहरबान होते थे. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया है. जबकि सरकार का कहना है कि पारदर्शिता लाने के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आए थे. ताकि कोई भी पार्टी अपने आय और व्यय को साफ रखे और चुनाव आयोग को जानकारी देने के लिए बाध्य हो.
'एहसान तले दबी रहती है सरकार?'
दरअसल, याचिकाकर्ता का कहना था कि सत्तारूढ़ दल या सत्ता में आने वाले पार्टी को बहुत ज्यादा पैसा मिलता है. क्योंकि कॉरपोरेट घराने उनको पैसा देते हैं और सत्ता में आने पर अपने हित से जुड़े काम करवाते हैं और मदद लेते हैं. चंदा लेने वाली पार्टी उनके एहसान के तले दबी रहती है. लिहाजा उनके अनुसार काम करती है और गैरकानूनी काम को भी कानूनी अमलीजामा पहनाने से पीछे नहीं हटती है.
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जानिए अटल-नेहरू काल से जुड़ा रोचक किस्सा....

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