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गलती हो तो अरबी बाबा मुंह पर थूक देते हैं, दरवाजे पर कुंडी नहीं, डेढ़ साल से चौबीसों घंटे की नौकरानी हूं: आपबीती गल्फ में फंसी पंजाबी युवती की

गलती हो तो अरबी बाबा मुंह पर थूक देते हैं, दरवाजे पर कुंडी नहीं, डेढ़ साल से चौबीसों घंटे की नौकरानी हूं: आपबीती गल्फ में फंसी पंजाबी युवती की

AajTak
Saturday, June 15, 2024 06:54:45 AM UTC

'मेरे कमरे में लॉक नहीं है. जब भी किसी को जरूरत पड़े, आवाज देकर बुला लेता है, चाहे सुबह के 5 बजे हों, या आधी रात. कोई काम पसंद न आए, मालिक मुंह पर थूक देते हैं. मेरा काम थूक पोंछकर फिर काम पर लग जाना है.' भारत से काम की तलाश में खाड़ी मुल्क जाते मजदूरों पर तो बात होती है, लेकिन औरतों की तकलीफ यहां भी परदे की ओट में हैं. ये कहानी है जसमीत की, जो डेढ़ साल से 14 लोगों के घर में कैद हैं.

कुवैत के मंगाफ शहर में एक रिहाइशी इमारत में आग लगने पर 50 मौतें हो गईं, जिनमें से 45 भारतीय थे. छह मंजिला इमारत में हुए हादसे के बाद पूरा कुवैत विदेशी मजदूरों के साथ बर्ताव को लेकर घेरे में है. इस समेत तमाम गल्फ देशों में भारी संख्या में भारतीय कामगार जा रहे हैं. महिलाएं भी इसका हिस्सा हैं. चमकते मुल्क में ऊंची कमाई का सपना लिए ये गल्फ पहुंचती और वहां के अंधेरों में खोकर रह जाती हैं. जसमीत ऐसा ही एक चेहरा हैं...

गल्फ देशों में लाखों भारतीय कामगार बसे हुए हैं. इनमें कुवैत या कतर ही नहीं, ओमान भी है. मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स की साइट के मुताबित इस खाड़ी देश में साढ़े 6 लाख से ज्यादा भारतीय रहते हैं, जिनमें पेशेवर कम, मजूदर ज्यादा हैं. ये इस तेल-देश की कुल आबादी का 13 फीसदी से भी ज्यादा हैं. इसमें महिलाओं का आंकड़ा अलग से नहीं दिखता. न ही उनके दुख-दर्द लिखे-पढ़े जाते हैं. ऐसी ही एक महिला- जसमीत से हमारी फोन पर बात हुई, जो करीब डेढ़ सालों से ओमान में रह रही हैं. उनके पास न पासपोर्ट है, न पैसे और न ही निकल भागने की उम्मीद.

पंजाब की रहने वाली 32 साल की महिला से कई किस्तों में हमारी बात हो सकी. बीच-बीच में अरबी लहजे में नाम पुकारने की आवाज के बाद फोन पर चुप्पी छा जाती थी. हमने सवालों का फॉर्मेट बदलकर तय किया कि जितनी हो सके, छोटी बात करें. रूटीन बातचीत ताकि उन्हें कोई नुकसान न हो.

यहां कैसे पहुंची के जवाब में वो दबी हुई आवाज और फर्राटेदार पंजाबी में कुछ-कुछ बताती हैं, जिसका हिंदी तर्जुमा है- धोखा मिला जी!  इंडिया में भरा-पूरा परिवार है. लेकिन सब के सब बीमार. पति को एडवांस डायबिटीज है. ससुर बिस्तर पकड़ चुके. बेटी अभी छोटी है. घर पर कमाने वाला कोई है नहीं. किसी के मार्फत हमें एजेंट मिला. होशियारपुर में बैठे एजेंट ने लाख रुपयों के बदले दुबई में बढ़िया नौकरी दिलवाने का वादा किया, लेकिन पहुंची मैं ओमान. यहां कई दिन एक फ्लैट में रखने के बाद मुझे एक के बाद एक दो परिवारों में भेज दिया गया. फिलहाल 14 लोगों के घर में मैं भिश्ती, बावर्जी, कहारन सब कुछ हूं. वो भी बिना छुट्टी के.

फोन पर बात करने मिल जाता है आपको? हां. लेकिन यहां की लड़की बड़ी तेज है. कॉलेज में पढ़ती है. उसे हिंदी काफी आती है. उसके सामने बात भी नहीं हो सकती. और फिर वक्त ही नहीं मिलता कि फोन कर सकूं, या उठा सकूं. इससे पहले जिस घर में रखा गया था, वहां फोन रखने पर मनाही थी. तब कई महीने घरवालों की खबर के बिना रही.  क्या-क्या काम करना होता है? सब.  क्या सब? सब जी. घर में बंदियों को जितने काम होते हैं, सबकुछ. साफ-सफाई. खाना-पकाना. साग-सब्जियां धोना. दौड़कर हाथ में पानी देना. खाने की टेबल साफ करना. बर्तन धोना...14 आदमी हैं घर में. एक बंदा 14 बार भी पुकारे तो दिन में 2 सौ बार बुलाहट हो जाती है.  रोज कितने घंटे काम करती हैं?  24 घंटे. इन्हीं के घर में रहती हूं. मेरे कमरे में दरवाजा भी नहीं. जब आवाज देंगे, मुझे जाना होगा.  इतने महीनों में कोई ऑफ, हफ्ते की छुट्टी तो मिली होगी? नहीं जी. कभी नहीं.  अच्छा, कमरा कैसा है आपका? अटाली है. घर का बेकार सारा सामान यहां रखा है. कपड़े प्रेस यहीं होते हैं. बेकार बर्तन यहीं जमा रहते हैं. टूटी कुर्सियां, पुराने कारपेट सबके बीच मेरा बिस्तर है.  खाना किस तरह का मिलता है, सुना है अरब में काफी शानदार देग पकती है? चावल देते हैं दो टाइम. कभी-कभी एक बार. सबके खा चुकने के बाद जो बच जाए, वो नौकरों में बंट जाता है. लेकिन सबसे ज्यादा तकलीफ है कि मैं अपने मुल्क का नाम भी नहीं ले सकती. वो लोग गुस्सा करते हैं कि यहां हो तो वहां की बात-तारीफ मत करो. एक साथ कई लोग अपना-अपना काम करने को कहते हैं. दौड़-भाग में कुछ चूक हो जाए तो गंदी गालियां देते हैं. 

आपको कैसे पता वो क्या बोलते हैं, आप अरबी जानती हैं! कुछ सेकंड्स की चुप्पी के बाद फोन पार से आवाज आती है- गाली सबकी जबान में एक-सी होती है, जैसे प्यार समझ आता है. चिल्लाते हुए कई बार मुझपर थूक देते हैं. मैं बदले में गुस्सा नहीं कर सकती. अनजान देश- अनजान लोग. पीछे पूरा परिवार मुझपर टिका है. थूक साफ करके काम में लग जाती हूं.  वे आपकी बोली नहीं जानते. आप उनकी भाषा नहीं समझतीं, फिर आपस में बात कैसे होती है? मैं पढ़ी-लिखी हूं. थोड़ी इंग्लिश, थोड़ी उर्दू मिलाकर काम चल जाता है. वैसे भी कौन सा दुख-दर्द की बातें बांटनी हैं. वो काम बोलते हैं, मैं हां करती हूं.  अभी क्या चाहती हैं? फोन पर जसमीत को हमसे कनेक्ट भी ओमान के ही एक भारतीय ने किया था, ये भरोसा दिलाते हुए कि इससे उन्हें मदद मिल सकेगी. 'जिन पैसों के लिए यहां आई, वो भी महीनों नहीं मिलता. कहते हैं कि एजेंट को दे देंगे. एजेंट के पास पैसे जाते हैं, वो काट-कूटकर घर भेजता है. अब मैं थोड़े दिन के लिए अपने देश लौटना चाहती हूं. बच्चों से मिल लूंगी.' फिर क्या दिक्कत आ रही है? मैंने 15 दिन की छुट्टी मांगी तो उन्होंने 2 लाख रुपए जमा करने को कहा. कहते हैं कि ओमान लौटूंगी तो पैसे भी वापस दे देंगे. घर पर इतने पैसे होते तो मैं क्यों छोटे बच्चों को छोड़कर अनजान देश में नौकरानी बनने आती! किसी तरह पति ने एक लाख रुपयों का इंतजाम किया, लेकिन वे लोग कम पर मानने को राजी नहीं.

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