
ऑपरेशन सिंदूर पर संसद के मानसून सत्र में चर्चा हुई तो विपक्ष को क्या फायदा मिलेगा?
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ऑपरेशन सिंदूर के बीच विदेश दौरे से लौटे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के संसदों के सामने अब मानसून सत्र चुनौती बनने वाला है. सवाल है कि क्या संसद में भी वे विदेश दौरे की तरह राष्ट्रवादी रुख पर कायम रह पाएंगे? और, बहस हुई तो विपक्ष को क्या हासिल होगा - सरकार के समर्थन का श्रेय या नई फजीहत?
ऑपरेशन सिंदूर पर भारत का पक्ष दुनिया को बताने के बाद सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य विदेश दौरे से लौट आये हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सांसदों की मुलाकात भी हो चुकी है. रिपोर्ट देने और बाकी हिसाब किताब देने जैसी औपचारिकताएं, बची हैं तो वे भी पूरी हो जाएंगी.
अब राजनीति के दो खास मौके आने वाले हैं. एक, संसद का मॉनसून सत्र और दूसरा बिहार विधानसभा का चुनाव - ये तो मानकर चलना चाहिये कि बिहार चुनाव में तो सभी अपनी अपनी राजनीतिक लाइन पर मोर्चा संभाले मिलेंगे, लेकिन संसद में अलग रंग देखने को मिल सकता है, और ये प्रतिनिधिमंडल में शामिल सांसद के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती भी है.
सवाल ये है कि प्रतिनिधिमंडल में शामिल नेताओं का संसद में क्या रुख होगा?
क्या संसद में भी ये नेता वही रुख अख्तियार करेंगे, जो विदेश दौरे में देखने को मिला है, या लौटने के बाद घरेलू राजनीति उन पर हावी हो जाएगी?
क्या सभी सांसदों का एक जैसा हाल होगा, या उनका व्यवहार उनके दबदबे और हैसियत के हिसाब से प्रभावित या बेअसर रहेगा?
स्पेशल नहीं, सिर्फ मॉनसून सेशन होगा

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