
एकनाथ शिंदे को भारी पड़ सकता है राज और उद्धव ठाकरे का साथ आना
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एकनाथ शिंदे की मुश्किलें तो महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आते ही शुरू हो गई थीं, राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के अचानक साथ आने से उसमें इजाफा हुआ है. महाराष्ट्र में मराठी मानुष का मुद्दा फिर उभर रहा है, और ऐसे माहौल में लंबे समय तक एकनाथ शिंदे की राजनीतिक प्रासंगिकता बने रहने पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं.
एकनाथ शिंदे एक साथ कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं. चुनौतियां तो उनके हिस्से की शिवसेना के मंत्री और विधायक भी बने हुए हैं, लेकिन सबसे बड़ा चैलेंज राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे का साथ आना है. क्योंकि जिन मुद्दों को लेकर एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की थी, राज ठाकरे के साथ आने से वो नैरेटिव ही पलट जाने का खतरा पैदा हो गया है.
उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे मिलकर राजनीतिक तौर पर क्या हासिल कर पाएंगे, ये तो आने वाले चुनावों के नतीजे ही बताएंगे - लेकिन तत्काल प्रभाव से दोनों भाइयों ने रैली करके एकनाथ शिंदे की मुश्किलें तो बढ़ा ही डाली हैं.
महाराष्ट्र में बीजेपी ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ जो नैरेटिव सेट किया था, एकनाथ शिंदे सियासी हालात के हिसाब से नायक बन कर उभरे थे. बीजेपी के लिए यही उनकी उपयोगिता भी थी. बीजेपी ने इस्तेमाल करके फेंका तो नहीं, लेकिन उनकी हदें तो तय कर ही दी. पहले उनको मुख्यमंत्री क्यों बनाया गया, और बाद में क्यों नहीं बनाया गया - एकनाथ शिंदे को अपनी राजनीतिक अहमियत समझने के लिए ये काफी है.
बीएमसी और स्थानीय निकायों के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, और शिंदे सेना के नेताओं की हरकतों से अलग ही विवाद हो रहा है - ऐसे में महाराष्ट्र विधानसभा के मॉनसून सेशन को बीच में छोड़कर एकनाथ शिंदे का दिल्ली दौरा और केंद्रीय मंत्री अमित शाह से मुलाकात सूबे की राजनीति में चर्चा का हॉट टॉपिक बना हुआ है.
शिंदे की मुश्किलें और दिल्ली दौरा
बीते हफ्ते एकनाथ शिंदे ने दिल्ली में केंद्रीय मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी. मुलाकात के कई कारण बताये जा रहे हैं, लेकिन जिन परिस्थितियों में एकनाथ शिंदे ने मॉनसून सेशन छोड़ कर दिल्ली का दौरा किया है, अलग ही संकेत मिल रहे हैं. एकनाथ शिंदे के केंद्रीय मंत्र नितिन गडकरी से भी मुलाकात की खबर आई है. नितिन गडकरी से मुलाकात का बहाना भले ही कोई प्रोजेक्ट हो, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में आज की तारीख में भी उनकी खास अहमियत मानी जाती है.

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