
इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व रखा फैसला, कहा- मेडिकल एंगल से देखा जाएगा हरीश का केस
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गाजियाबाद के हरीश राणा के लिए इच्छामृत्यु मांगने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह बहुत संवेदनशील मुद्दा है. हरीश के केस को मेडिकल एंगल से देखा जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को इच्छामृत्यु की मंजूरी देने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के बाद फैसला रिजर्व रख लिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हम पैसिव यूथेनेशिया शब्द का उपयोग नहीं करेंगे. कोर्ट ने फैसला रिजर्व रखते हुए कहा कि हम हर रोज फैसले लेते हैं, लेकिन ये मुद्दा बहुत संवेदनशील है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम भी नश्वर हैं. यह तय करने वाले हम कौन होते हैं कि कौन जिए और कौन मरे? जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा कि हम जीवन रक्षक चिकित्सकीय उपचार हटाने पर विचार करेंगे. हरीश के केस को मेडिकल एंगल से देखा जाएगा. इससे पहले, हरीश राणा के माता-पिता की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि हरीश का मामला प्राकृतिक मौत की प्रक्रिया को तेज करने से जुड़ा है.
एमिकस क्यूरी ने कोर्ट को बताया कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट्स के मुताबिक हरीश राणा अपनी मूल स्थिति में कभी वापस नहीं आ सकते. एमिकस क्यूरी ने कहा कि भले ही अभिभावक राजी हों और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट्स में जो भी हो, अंतिम निर्णय कोर्ट को ही लेना है. एमिकस क्यूरी ने कोर्ट में पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया बताई और कहा कि उनको अस्पताल के पेलिएटिव केयर में रखा जाएगा.
एमिकस क्यूरी ने कोर्ट को बताया कि इस प्रक्रिया के दौरान वर्षीय हरीश को कोई दर्द नहीं होगा. यह पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से किया जाएगा. एमिकस क्यूरी ने कहा कि पेलिएटिव केयर के दौरान कोई चिकित्सकीय इलाज नहीं किया जाएगा और हरीश की फीडिंग ट्यूब हटा दी जाएगी. कोई हस्तक्षेप नहीं होगा. उन्हें सेडेटिव दिए जाएंगे ताकि उन्हें कोई दर्द महसूस न हो. उन्हें मृत्यु तक आरामदायक स्थिति में रखा जाएगा.
एमिकस क्यूरी ने कोर्ट को 2023 में निर्धारित पैसिव यूथेनेशिया के दिशानिर्देशों की भी जानकारी दी और कहा कि 2018 में कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लिविंग विल को मान्यता दी थी और पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी थी. दिशानिर्देशों के अनुसार, यदि मरीज के पास लिविंग विल नहीं है, जैसा कि हरीश राणा के मामले में है, तो मेडिकल बोर्ड और अदालत की अनुमति के बाद ही पैसिव यूथेनेशिया पर विचार किया जा सकता है. हरीश राणा के मामले में फीडिंग ट्यूब भी लाइफ सपोर्ट का रूप है.
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का हवाला देते हुए एमिकस क्यूरी ने कहा कि फीडिंग ट्यूब भी जीवन रक्षक प्रणाली (लाइफ सपोर्ट) का एक रूप है. हादसे के बाद से पिछले करीब 13 वर्षों से हरीश की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. फीडिंग ट्यूब हर दो-तीन महीने में बदलनी पड़ती है. घर पर उनकी देखभाल की जा रही है, लेकिन स्थिति वही बनी हुई है.

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