
आज का दिन: BJP के लिए मुसीबत बनी कांग्रेस की कमजोरी और AAP की मजबूती?
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बीजेपी को आम आदमी पार्टी के उदय से क्यों चिंतित होना चाहिए? कांग्रेस को रिप्लेस करती आप किस तरह से बीजेपी के लिए परेशानी का सबब है? क्षेत्रीय दलों के लिए भी आप का उदय मुसीबत की तरह देखा जाना चाहिए क्या?
पंजाब में आम आदमी पार्टी से भगवंत मान अब नए मुख्यमंत्री हो गए हैं. कल पद और गोपनीयता की शपथ ले ली गई. अब पंजाब में आम आदमी पार्टी को सत्ता की चाभी मिलना कांग्रेस के लिए तो मुसीबत बना ही, सत्ताधारी दल बीजेपी के लिए भी मुश्किल है. कई राजनीति के जानकार ऐसा कहते हैं कि राजनीतिक विकल्प के रूप में आप का उदय बीजेपी की मुसीबत बढ़ा सकता है. दरअसल, बीजेपी ने 2014 में अपनी सरकार बनते ही एक नारा कांग्रेस मुक़्त भारत का दिया था. हालांकि इस नारे से उसका मतलब कांग्रेस को न चुन कर आप बीजेपी को चुनिए. लेकिन पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत ने कांग्रेस मुक़्त पंजाब तो ज़रूर किया पर बीजेपी के लिए कुछ नहीं छोड़ा. आम आदमी के एक एलेक्टोरल ऑप्शन बनने की सूरत में बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी होगी, जो बीजेपी कभी नहीं चाहेगी. ये समझने को कि बीजेपी को आम आदमी पार्टी के उदय से क्यों चिंतित होना चाहिए? कांग्रेस को रिप्लेस करती आप किस तरह से बीजेपी के लिए परेशानी का सबब है ? क्षेत्रीय दलों के लिए भी आप का उदय मुसीबत की तरह देखा जाना चाहिए क्या?
कांग्रेस में खेला पे खेला हो रहा है. पंजाब में पार्टी के अंदर एक दूसरे पर हार का ठिकरा फोड़ा जा रहा है. दूसरी ओर कोई सोनिया गांधी को पार्टी का अध्यक्ष पद पर बने देखना चाहता है, तो कोई राहुल गांधी का नाम सुझाता है और एक धड़ा है जो कहता है अध्यक्ष की कुर्सी पर गांधी परिवार के बाहर के किसी कांग्रेसी नेता को बैठाओ. इसी धड़े को जी-23 के नाम से लोग जानते हैं. इसे आप असंतुष्टों की एक टोली भी कह सकते हैं, जो पार्टी के ख़िलाफ़ अक्सर अपनी बात को रखते रहते हैं. अब जब दो दिनों पहले ये तय हुआ की सोनिया गांधी, कांग्रेस की प्रेसिडेंट बनी रहेंगी तो जी-23 के नेताओं ने इसको लेकर अपनी असहमति ज़ाहिर की थी. कपिल सिब्बल ने एक रोज़ पहले कहा कि कांग्रेस की बागडोर गांधी परिवार के बाहर किसी को दी जाए. लेकिन इस बयान के बाद पार्टी में ही हंगामा हो गया. सलमान खुर्शीद, मल्लिकार्जुन खड़गे समेत कई नेता सिब्बल को घेरने लगे.
अब इन्ही सब के बीच कल जी-23 की बैठक बुलाई गई. पहले ये मीटिंग कपिल सिब्बल के घर पर होनी थी मगर फिर वेन्यू गुलाम नबी आज़ाद के घर पर शिफ्ट हो गया. मीटिंग शाम में शुरू हुई और पांच घंटे मीटिंग चली. तो मीटिंग के दौरान किन बातों पर चर्चा हुई और क्या सार निकल कर आया? एक दरार जो कांग्रेस में पिछले एक-ढ़ेड साल से दिख रही है हमें, क्या वो और गहरी होती जा रही है पांच राज्यों में हार के बाद?
उत्तराखंड में बीजेपी वापस से सत्ता में आई है. हालांकि प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद चुनाव हार गए. 2022 का ये चुनाव कई बड़े पेड़ों के गिरने के लिए जाना जाएगा. न सिर्फ पुष्कर सिंह धामी बल्कि कांग्रेस ने जिसके चेहरे और नेतृत्व में ये विधानसभा चुनाव लड़ा, कांग्रेस के कद्दावर नेता... हरीश रावत भी चुनाव हार गए. वो लालकुंआ विधानसभा सीट से मैदान में थे. रावत के पिछले कुछ दिनों के राजनीतिक सफर को देखें तो मुख्यमंत्री की रेस में या मुख्यमंत्री रहने के बावजूद चुनाव के मैदान में रावत कई चुनाव लगातार हार चुके हैं. इन चुनावों से पहले 2017 विधानसभा चुनाव में रावत हरिद्वार रूरल और किच्छा सीट से लड़े थे. जहां से दोनों जगह उन्हें हारना पड़ा था. 2019 लोकसभा चुनाव में रावत नैनीताल से लोकसभा चुनाव लड़े. और यहां भी मात खाई. इन चुनावों में फिर से हरीश रावत पार्टी के चेहरा बन कर लीड कर रहे थे. और लालकुंआ सीट से मैदान में थे. लेकिन न कांग्रेस सत्ता में आ सकी और न रावत चुनाव जीत सके. सवाल ये है कि जो हरीश रावत मुख्यमंत्री के लिए मुफीद चेहरों में से एक थे वो अपनी सीट क्यों नहीं बचा सके ? क्या कारण है कि इतने लम्बी राजनीतिक पारी के बावजूद हरीश रावत पिछले कुछ समय से लगातार खुद चुनावी राजनीति में सफल नहीं हो पा रहे हैं? इन ख़बरों पर विस्तार से चर्चा के अलावा ताज़ा हेडलाइंस, देश-विदेश के अख़बारों से सुर्खियां, आज के दिन की इतिहास में अहमियत सुनिए 'आज का दिन' में अमन गुप्ता के साथ.
17 मार्च 2022 का 'आज का दिन' सुनने के लिए यहां क्लिक करें...

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संभल में दंगा मामले के बाद सीजेएम के तबादले को लेकर विवाद शुरू हो गया है. पुलिस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए गए थे लेकिन पुलिस ने कार्रवाई नहीं की. इस पर सीजेएम का अचानक तबादला हुआ और वकील प्रदर्शन कर रहे हैं. समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और AIMIM ने न्यायपालिका पर दबाव बनाने का आरोप लगाया है. इस विवाद में राजनीतिक सियासत भी जुड़ी है. हाई कोर्ट के आदेशानुसार जजों के ट्रांसफर होते हैं लेकिन इस बार बहस हुई कि क्या यहां राज्य सरकार ने हस्तक्षेप किया.

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