
अरविंद केजरीवाल INDIA ब्लॉक के नए 'ममता बनर्जी' बनते जा रहे हैं
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अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी, दोनों INDIA ब्लॉक में ‘अंदर-बाहर’ की रणनीति अपनाते देखे जा सकते हैं। ममता बनर्जी की ही तरह अब अरविंद केजरीवाल भी मुद्दों पर साथ हैं, लेकिन तकनीकी तौर पर उनकी पार्टी के नेता विपक्षी गठबंधन से अलग बता रहे हैं.
INDIA ब्लॉक आज की तारीख में सबसे ज्यादा एकजुट नजर आ रहा है. एकजुट होने से मतलब, मजबूत होना भी समझ सकते हैं. मजबूत इसलिए, क्योंकि संसद से लेकर सड़क तक ये मजबूती दिखाई देने लगी है. संसद से चुनाव आयोग के दफ्तर तक विपक्षी सांसदों का विरोध मार्च और प्रदर्शन. प्रदर्शन के दौरान अखिलेश यादव का पुलिस बैरिकेडिंग कूद कर पार करना, और अब बिहार में शुरू होने जा रही वोटर अधिकार यात्रा. वोटर अधिकार यात्रा में भी पूरे इंडिया ब्लॉक के एक साथ नजर आने का दावा किया जा रहा है.
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के डिनर में 25 दलों के 50 नेताओं का जुटना, ये बताने के लिए काफी था कि SIR का मुद्दा विपक्षी एकजुटता के लिए सही है, और ऐसा मुद्दे सामने आते हैं तो इंडिया ब्लॉक में नेतृत्व का विवाद भी कम से कम 2029 तक तो थम ही सकता है.
विरोध मार्च और मल्लिकार्जुन खड़गे के फाइव स्टार होटल वाले डिनर में संजय सिंह सहित आम आदमी पार्टी के तीन सांसदों की मौजूदगी हैरान करने वाली थी. ये कांग्रेस के लिए विपक्षी सपोर्ट की सबसे बड़ी उपलब्धि थी. और, बिहार की वोटर अधिकार यात्रा भी उसी का जमीनी विस्तार समझा जाना चाहिए.
ताज्जुब तो इंडिया ब्लॉक को लेकर अरविंद केजरीवाल के स्टैंड पर होना चाहिए. अरविंद केजरीवाल के तीन-तीन सांसदों का विपक्षी गठबंधन की मीटिंग में शामिल होना, और ऐन उसी वक्त ये दावा भी जारी रखना कि आम आदमी पार्टी इंडिया ब्लॉक का हिस्सा नहीं है, वस्तुस्थिति को समझने के लिए काफी है - और ये बिल्कुल वैसा ही जैसा इंडिया ब्लॉक के प्रति ममता बनर्जी की रुख रहा है.
सवाल तो ये है कि अगर अरविंद केजरीवाल इंडिया ब्लॉक से बाहर हैं, तो ममता बनर्जी कहां अंदर हैं - ये अंदर और बाहर होने की शर्तें क्या हैं?
क्या ऐसा नहीं लगता कि अरविंद केजरीवाल आज की तारीख में इंडिया ब्लॉक के साथ वैसा ही व्यवहार करने लगे हैं, जैसा अब तक सिर्फ ममता बनर्जी करती रही हैं. आखिर इंडिया ब्लॉक में ये कौन सा लुकाछिपी का खेल चल रहा है?

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