
अमेरिकी धमकी के बाद भी अलग सेना बनाने से हिचकिचा रहा यूरोप, क्यों मुश्किल है NATO का कोई विकल्प?
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म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस के दौरान वोलोडिमिर जेलेंस्की ने अलग ही अपील कर डाली. उन्होंने यूरोपियन देशों से अपनी एक अलग सेना बनाने की गुजारिश की ताकि अमेरिकी मूड-स्विंग्स में भी वे सेफ रह सकें. तो क्या यूरोप खुद ही NATO का विकल्प तैयार कर सकता है, या फिर ये गुस्सा वक्ती है?
वाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के आने के साथ ही ग्लोबल पावर डायनेमिक्स में उठापटक शुरू हो गई. पुराने अमेरिकी राष्ट्रपतियों से अलग ट्रंप रूस के कुछ करीब दिख रहे हैं. इसका असर ये रहा कि रूस-यूक्रेन जंग रोकने की चर्चा तो हो रही है, लेकिन यूक्रेन खुद इससे बाहर है. नाराज यूक्रेनी लीडर वोलोडिमिर जेलेंस्की ने यूरोपियन आर्मी बनाने की अपील की ताकि अमेरिकी ठंडेपन का असर उनकी सुरक्षा पर न पड़े.
अभी क्या नया हुआ जो चर्चा में है
हाल ही में जर्मनी के म्यूनिख में सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस हुई. यूरोप को उम्मीद थी कि ट्रंप बयान भले ही ऊटपटांग दे रहे हों लेकिन मंच पर वे संभले रहेंगे. यहां अमेरिका की तरफ से उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस प्रतिनिधि थे. उन्होंने भी ट्रंप की बात दोहराई. वेंस ने साफ कहा कि NATO ठीक-ठाक काम करे, इसके लिए जरूरी है कि यूरोप में इस सैन्य दल के सदस्य देश भी अपना डिफेंस बजट बढ़ाएं.
वेंस की ये मांग उतनी भी गैर वाजिब नहीं. असल में अमेरिका नाटो का सबसे बड़ा फंडिंग सोर्स है. बीते कुछ सालों में ये बात बार-बार आती रही कि अच्छी अर्थव्यवस्था के बाद भी कुछ देश पैसे खर्चने से बच रहे हैं, जबकि उनकी सुरक्षा का भी सारा भार यूएस पर आ रहा है. यही वजह है कि ट्रंप के पहले भी कई राष्ट्रपतियों ने डिफेंस बजट बढ़ाने को लेकर बात की. हालांकि ज्यादातर यूरोपियन देश इससे कन्नी काटते रहे.
कितना खर्च करता है यूएस
अमेरिका फिलहाल इस गुट के कुल खर्च का लगभग 70 फीसदी हिस्सा देता है. इसका भी कारण है. साल 2014 में सभी नाटो सदस्यों ने मिलकर तय किया था कि वे अपनी जीडीपी का कम से कम 2% डिफेंस पर लगाएंगे. यही वो न्यूनतम खर्च है, जिसे बिल भी कहा जाता है. ज्यादातर देश इस मामले में पीछे हैं, जबकि अमेरिका ने अपनी जीडीपी का सबसे लगभग साढ़े 3 प्रतिशत डिफेंस पर खर्च किया.

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