
अधीर vs यूसुफः बहरामपुर सीट से कभी नहीं जीती TMC, ममता को पठान से क्यों उम्मीदें?
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टीएमसी ने बहरामपुर सीट से क्रिकेटर यूसुफ पठान को उम्मीदवार बनाया है. टीएमसी यह सीट कभी नहीं जीत पाई है. लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी 1999 से ही इस सीट से जीतते आ रहे हैं. अब ममता बनर्जी को यूसुफ पठान से उम्मीदें क्यों हैं?
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने सूबे की सभी 42 लोकसभा सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है. ममता बनर्जी की पार्टी ने मुर्शिदाबाद जिले की बहरामपुर सीट से पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान को मैदान में उतारा है. 2007 के टी20 और 2011 के एकदिवसीय विश्वकप विजेता भारतीय टीम के सदस्य रहे यूसुफ गुजरात से नाता रखते हैं. टीएमसी ने उन्हें पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के खिलाफ उतार दिया है तो इसके पीछे क्या रणनीति है? इसे समझने के लिए इस सीट के चुनावी अतीत, सियासी मिजाज और वोटों के गणित की चर्चा जरूरी है.
बहरामपुर में कभी नहीं जीत सकी टीएमसी
बहरामपुर लोकसभा सीट के चुनावी अतीत की बात करें तो आजादी के बाद 1952 से 1980 तक यहां से रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के त्रिदिब चौधरी लगातार सात बार सांसद रहे. 1984 में आतिश चंद्र सिन्हा ने यह सीट पहली बार कांग्रेस की झोली में डाल दी. आरएसपी ने फिर से वापसी की और 1998 तक नानी भट्टाचार्य और प्रमोथ्स मुखर्जी पार्टी के टिकट पर संसद पहुंचते रहे. 1999 में अधीर रंजन चौधरी पहली बार इस सीट से सांसद निर्वाचित हुए और तब से अब तक, वह लगातार पांच बार सांसद निर्वाचित हो चुके हैं. बहरामपुर ऐसी सीट है जहां अपनी स्थापना के बाद से अब तक, टीएमसी कभी नहीं जीत सकी है.
अधीर को हराना ममता के लिए क्यों जरूरी
बहरामपुर सीट पर टीएमसी का फोकस 2019 चुनाव के पहले से ही है लेकिन बदली परिस्थितियों में ममता बनर्जी के लिए अधीर रंजन चौधरी को हराना उच्च प्राथमिकता बन गया है. दरअसल, अधीर रंजन बंगाल की सीएम के खिलाफ सबसे मुखर चेहरा हैं. ममता के खिलाफ वह तब भी लगातार हमले बोलते रहे जब टीएमसी की नेता इंडिया गठबंधन की बैठकों में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के साथ मंच साझा कर रही थीं. टीएमसी नेताओं ने पार्टी के कांग्रेस से किनारा करने के पीछे भी अधीर की बयानबाजियों को वजह बताया था.
बहरामपुर में दीदी को क्यों दिख रही उम्मीद

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