
UK कोर्ट की हरी झंडी...वहां की सरकार राजी, भगोड़े संजय भंडारी का क्यों नहीं हो रहा प्रत्यर्पण?
AajTak
आर्म्स डीलर संजय भंडारी का भारत प्रत्यर्पण अभी तक नहीं हो पाया है. इससे बचने के लिए उसके यूके हाई कोर्ट में एक बार फिर याचिका दायर कर दी है. उस याचिका में उसने ब्रिटेन सरकार के उस फैसले को चुनौती दी है जहां पर कहा गया कि भंडारी का भारत प्रत्यर्पण किया जाए.
आर्म्स डीलर संजय भंडारी के भारत प्रत्यर्पण का इंतजार लंबा होता जा रहा है. एक कानूनी बाधा दूर होती है तो दूसरी खड़ी हो जाती है. पिछले कई सालों इन्हीं कानूनी जटिलताओं की वजह से संजय भंडारी भारत आने से बच रहा है. अब एक बार फिर उसकी तरफ से यूके हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी गई है. उसने अपने प्रत्यर्पण का विरोध किया है. अब कोर्ट कब तक उसकी याचिका पर फैसला सुनाता है, अभी स्पष्ट नहीं.
भंडारी का आखिरी दांव क्या है?
जानकारी के लिए बता दें कि ब्रिटेन की गृह मंत्री सुएला ब्रेवरमैन ने भंडारी के प्रत्यर्पण को मंजूरी दे दी थी. उसे कानूनी सहायता के लिए 14 दिनों का समय दिया गया था. उन 14 दिनों में ही उसे कोई फैसला लेना था. अब शुक्रवार वो आखिरी दिन था जब भंडारी कानूनी सहायता ले सकता था और उम्मीद के मुताबिक उसने ऐसा किया भी. यूके हाई कोर्ट में उसने ब्रिटेन सरकार के फैसले को चुनौती दे दी है. अगर वो ये कानूनी सहायता नहीं लेता तो उसका भारत आना तय था. उसका तुरंत प्रत्यर्पण हो जाता.
भंडारी पर क्या आरोप लगे हैं?
असल में भंडारी पर आरोप है कि उसने बड़ी संख्या में काला धन विदेश भेजा था. टैक्स देने से बचा जा सके, इसलिए अपने साथियों की मदद से भंडारी ने काफी पैसा बाहर भेजा. इस वजह से नेशनल एक्सचेंजर को बड़ा नुकसान हुआ. बाद में संजय भंडारी के प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा से भी कनेक्शन सामने आए थे. साल 2016 में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने भंडारी से वाड्रा की 2012 की फ्रांस ट्रिप को लेकर भी कई सवाल पूछे थे. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के मुताबिक भंडारी के कई विदेशी कंपनियों में एसेट मौजूद हैं. लेकिन उनको लेकर कोई भी पारदर्शिता नहीं है और आज तक भंडारी ने उसको लेकर आयकर विभाग को कोई जानकारी नहीं दी. इस सब के अलावा संजय भंडारी पर एक और बड़ा आरोप चल रहा है. उस पर रक्षा सौदों में रिश्वत लेने का आरोप है. यूपीए के जामने में हुई कुछ डीलों को लेकर वो विवाद है जिसमें संजय भंडारी का नाम भी सामने आया है.

ट्रंप ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम को संबोधित करते हुए कहा कि मुझे यूरोप से प्यार है लेकिन वह सही दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा है. दुनिया हमें फॉलो कर बर्बादी के रास्ते से बच सकती है. मैंने कई मुल्कों को बर्बाद होते देखा है. यूरोप में मास माइग्रेशन हो रहा है. अभी वो समझ नहीं रहे हैं कि इसके क्या-क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं. यूरोपीयन यूनियन को मेरी सरकार से सीखना चाहिए.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड के दावोस में ग्रीनलैंड को लेकर बड़ा प्रस्ताव रखा है. उन्होंने साफ कहा है कि अगर ग्रीनलैंड अमेरिका को नहीं दिया गया तो वे यूरोप के आठ बड़े देशों पर टैरिफ लगाएं जाएंगे. इस स्थिति ने यूरोप और डेनमार्क को ट्रंप के खिलाफ खड़ा कर दिया है. यूरोप और डेनमार्क ने स्पष्ट कर दिया है कि वे ट्रंप के इस ब्लैकमेल को बर्दाश्त नहीं करेंगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विमान को एक तकनीकी खराबी की वजह से वापस वाशिंगटन लौट आया. विमान को ज्वाइंट बेस एंड्रयूज में सुरक्षित उतारा गया. ट्रंप के एयर फोर्स वन विमान में तकनीकि खराबी की वजह से ऐसा करना पड़ा. विमान के चालक दल ने उड़ान भरने के तुरंत बाद उसमें एक मामूली बिजली खराबी की पहचान की थी. राष्ट्रपति ट्रंप वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की बैठक में शिरकत करने के लिए स्विट्ज़रलैंड के दावोस जा रहे थे.

ग्रीनलैंड में आजादी की मांग दशकों से चल रही है. फिलहाल यह द्वीप देश डेनमार्क के अधीन अर्ध स्वायत्त तरीके से काम करता है. मतलब घरेलू मामलों को ग्रीनलैंडर्स देखते हैं, लेकिन फॉरेन पॉलिसी और रक्षा विभाग डेनमार्क सरकार के पास हैं. अब कयास लग रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद के बीच वहां अलगाववाद को और हवा मिलेगी.

स्विटजरलैंड के दावोस में चल रहे WEF की बैठक में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने ट्रंप को बताया कि अमेरिका जैसी शक्ति को क्यों कानून आधारित वर्ल्ड ऑर्डर का सम्मान करना चाहिए. उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में बहुपक्षवाद के बिखरने का डर सता रहा है. मैक्रों ने कहा कि दुनिया में जोर जबरदस्ती के बजाय सम्मान और नियम-आधारित व्यवस्था को प्राथमिकता देने की जरूरत है.

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के दावोस भाषण ने उस धारणा को तोड़ दिया कि वेस्टर्न ऑर्डर निष्पक्ष और नियमों पर चलने वाली है. कार्नी ने साफ इशारा किया कि अमेरिका अब वैश्विक व्यवस्था को संभालने वाली नहीं, बल्कि उसे बिगाड़ने वाली ताकत बन चुका है. ट्रंप के टैरिफ, धमकियों और दबाव की राजनीति के बीच मझोले देशों को उन्होंने सीधा संदेश दिया है- खुद को बदलो, नहीं तो बर्बाद हो जाओगे.







