
ईरान युद्ध का ‘शिखंडी’... कैसे ट्रंप की आड़ में मनमाने होते चले गए नेतन्याहू
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ईरान जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, पता ये चल रहा है कि सारे सूत्र इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के हाथ में है. डोनाल्ड ट्रंप बस उनकी ढाल बनकर रह गए हैं. बेबस.
महाभारत के भीष्म पर्व की वह शाम याद कीजिये. कुरुक्षेत्र के मैदान में अजेय भीष्म खडे थे. पांडवों की सेना के पास उनकी कोई काट नहीं थी. तब अर्जुन के रथ के आगे एक चेहरा खड़ा किया गया- शिखंडी. भीष्म ने शस्त्र त्याग दिये क्योंकि उनके सामने एक स्त्री (किन्नर रूप में) खडी थी.
शिखंडी का वजूद सिर्फ एक मकसद के लिए था- बदला. पिछले जन्म में वह अंबा थी. भीष्म द्वारा ठुकराई गई. अपमानित और कुंठा से भरी अंबा. उसने अग्नि में कूदते समय कसम खाई थी कि वह भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी. अगले जन्म में वह राजा द्रुपद के यहां पैदा हुई और भीष्म के पतन की ढाल बनी. शिखंडी खुद युद्ध नहीं जीत रहा था, वह तो बस उस मौके का जरिया था जिसका फायदा अर्जुन उठा रहे थे.
आज के मिडिल ईस्ट के रणक्षेत्र में डोनाल्ड ट्रंप वही शिखंडी बन गए हैं. अपने पिछले कार्यकाल के अपमान और कुंठा से भरे हुए. दुनिया को सबक सिखाने के लिए आतुर. बेशक उनके बैकग्राउंड का अंबा से कोई लेना-देना नहीं है, और ईरान भी कोई भीष्म नहीं है. लेकिन, इतना तो दुनिया देख ही रही है कि ट्रंप को ढाल बनाकर बेंजामिन नेतन्याहू ईरान पर कैसे अपने अचूक बाण चला रहे हैं.
नेतन्याहू का पुराना सपना और ट्रंप का कंधा
इजरायल पिछले 40 साल से ईरान पर सीधा हमला करने की फिराक में था. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही ईरान, इजरायल की आंखों में चुभ रहा था. लेकिन अमेरिका के हर राष्ट्रपति ने, चाहे वो बुश हों, ओबामा हों या बाइडेन, इजरायल की लगाम कसकर रखी. वाशिंगटन को डर था कि ईरान पर हमले का मतलब होगा पूरी दुनिया में तेल की किल्लत और तीसरा विश्व युद्ध.
लेकिन नेतन्याहू जानते थे कि ट्रंप अलग मिट्टी के बने हैं. ट्रंप के भीतर एक अजीब किस्म का 'इगो' है. वह खुद को दुनिया का सबसे ताकतवर लीडर दिखाना चाहते हैं. नेतन्याहू ने इसी मनोविज्ञान को पकडा. उन्होंने ट्रंप को यह यकीन दिलाया कि ईरान के साथ हुई परमाणु डील ट्रंप की हार है और उसे तोडना उनकी मर्दानगी का सबूत होगा. पिछले साल जून से लेकर इस साल के 28 फरवरी तक, नेतन्याहू ने हर वह चाल चली जिससे ट्रंप इस युद्ध में गहरे धंसते चले जाएं.

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