
Singham Again Review: अजय देवगन समेत आधा दर्जन स्टार्स भी नहीं बना पाए माहौल, रामायण एंगल ने तोड़ा कहानी का फ्लो
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मसाला फिल्मों में लॉजिक नहीं खोजा जाना चाहिए, ये बिल्कुल सच बात है. मगर एक मसाला फिल्म को अपने खुद के लॉजिक में थोड़ा इंटेलिजेंट दिखने की कोशिश तो जरूर करनी चाहिए. 'सिंघम अगेन' एक और ग्रैंड फिल्म बनाने की कोशिश में बहुत सारी चीजों को जोड़कर, उन्हें संभालने में नाकाम फिल्म नजर आती है.
एक मसाला फिल्म अगर आपसे सीटी न बजवा दे, पैरों में करंट न दौड़ा दे और आपको हूटिंग करने पर मजबूर न कर दे, तो फिर वो सच्ची मसाला फिल्म नहीं होती. शायद उसमें मसाला कच्चा रह गया है, सही से पका नहीं है. रोहित शेट्टी के कॉप यूनिवर्स का अवेंजर्स मोमेंट बनकर आई 'सिंघम अगेन' देखने का मकसद ही यही है कि आदमी त्यौहार के मौके पर, दिमाग और लॉजिक किनारे रख के सिर्फ एन्जॉय करे.
अजय देवगन स्टारर 'सिंघम अगेन' का ट्रेलर एक्शन, ड्रामा, स्टारकास्ट और बड़ी स्क्रीन पर धमाका करने वाले हर तरह के मोमेंट का वादा कर रहा था. लेकिन क्या रोहित शेट्टी अपने वादे के मुताबिक मारक मजा डिलीवर कर पाए? इस सवाल का जवाब जरा पेंचीदा है.
क्या है कहानी? 'सिंघम अगेन' की कहानी कश्मीर से शुरू होती है, जहां बाजीराव सिंघम ने 'आतंकवाद का नामोनिशान मिटा दिया है.' फिल्म बताती है कि सिंघम की फोर्स ने मिलिटेंट बन चुके युवाओं को रिफॉर्म करके उन्हें भी फ़ोर्स का हिस्सा बनाया है. कश्मीर टूरिज्म के इस विज्ञापन के बीच ही सिंघम पर अटैक होता है. लेकिन सिंघम न सिर्फ अटैक से बचता है, बल्कि हमलावर को दबोच भी लेता है जो कोई और नहीं उमर हाफिज (जैकी श्रॉफ) है.
यहां समझ नहीं आता कि कौन सा फैक्ट ज्यादा चौंकाने वाला है- इस उम्र में जैकी को धुआंधार तरीके से बाइक राइड करते देखना या फिर पिछली कॉप यूनिवर्स फिल्मों में भयानक माने जा रहे किरदार का शुरू में ही अरेस्ट हो जाना?
उमर ने सिंघम को बताया है कि कोई है जो उससे भी खतरनाक है और वो आ रहा है. इतना पता है कि वो तमिलनाडु से आएगा. अबतक मिनिस्टर बने रवि किशन भी आपको नजर आ चुके हैं और एक देशभर में आतंक को काउंटर करने के लिए एक नया स्क्वाड बन चुका है जिसका नाम है 'शिवा स्क्वाड'. इस स्क्वाड में हर इलाके के 'सिंघम' ऑफिसर्स हैं. तो तमिलनाडु से आने वाले खतरे को हैंडल करने की जिम्मेदारी दी जाती है लेडी सिंघम उर्फ शक्ति शेट्टी को. उसे एक छोटी कामयाबी मिलती है, लेकिन बड़ी नाकामयाबी.
यहां पहली बार आपको फिल्म का विलेन 'डेंजर लंका' (अर्जुन कपूर) नजर आता है. वो शक्ति शेट्टी के पुलिस स्टेशन में घुसकर 15 पुलिस वालों को मार डालता है. हालांकि, जिस तरह वो इस कांड को अंजाम देता है उससे आपको साउथ की कई फिल्में याद आएंगी. शक्ति शेट्टी अपने थाने पर ये हमला इसलिए नहीं रोक पातीं, क्योंकि उनका फोन नहीं लग रहा था. ये टिपिकल रोहित शेट्टी वाली दिक्कतें हैं, जो उनकी हर फिल्म में रहती हैं.

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