
NATO के टूटने का खतरा... ट्रंप अगर ग्रीनलैंड पर चढ़ बैठे तो क्या बचेगा अमेरिका और यूरोप के बीच?
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उत्तरी ध्रुव के नजदीक मौजूद ग्रीनलैंड की पहचान दुनिया के सबसे बड़े द्वीप के रूप में रही है. डेनमार्क के अधीन इस द्वीप पर सिर्फ 56 हजार लोग रहते हैं, उसमें से भी 18 हजार राजधानी न्यूक में. लेकिन, बर्फ से ढंका ग्रीनलैंड अब डोनाल्ड ट्रंप की नजरों में चढ़ गया है. और इस पर कब्जे की आशंका ने NATO को खतरे में डाल दिया है.
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब ग्रीनलैंड को 'खरीदने' की बात कर रहे थे, तब दुनिया ने इसे सनक, मजाक या रियल-एस्टेट कारोबारी की भाषा मानकर टाल दिया था. लेकिन जब उन्हीं ट्रंप के करीबी लोग यह कहने लगें कि 'सैन्य विकल्प भी खुले हैं', तब मामला मजाक से निकलकर अंतरराष्ट्रीय कानून और ग्लोबल सिक्योरिटी ऑर्डर के अस्तित्व तक पहुंच जाता है.
वेनेजुएला हमले को लेकर यूरोपीय देश जिस इस्तीनान से डोनॉल्ड ट्रंप को ये कहते हुए बधाई दे रहे थे कि उन्होंने मादुरो जैसे तानाशाह और नार्को टेररिस्ट के साथ सही सुलूक किया है, वे अब ग्रीनलैंड के मामले में सकते में हैं. क्योंकि सवाल सिर्फ ग्रीनलैंड का नहीं रह जाता है, सवाल यह हो जाता है कि अगर अमेरिका अपने ही सहयोगी के खिलाफ बल प्रयोग करता है, तो फिर संयुक्त राष्ट्र और NATO जैसे संगठनों की हैसियत क्या रह जाएगी? और वैसे भी अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप यूरोपीय देशों पर NATO में उनका अंशदान बढ़ाने के लिए दबाव दे रहे थे. वे साफ शब्दों में कह चुके हैं कि यूरोप की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब अमेरिका अकेला नहीं उठाएगा. यानी, ट्रंंप के लिए NATO एक ताकत से ज्यादा बोझ है.
ग्रीनलैंड कोई लावारिस जमीन नहीं है. यह डेनमार्क का स्वायत्त इलाका है. उसकी अपनी संसद और सरकार है. लेकिन उसकी अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता डेनमार्क के अधीन है. यानी ग्रीनलैंड पर हमला सीधे-सीधे डेनमार्क पर हमला होगा. और डेनमार्क कोई अमेरिका का दुश्मन देश नहीं, बल्कि अमेरिका का दशकों पुराना NATO सहयोगी है.
ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे से यूएन चार्टर का क्या होगा?
अगर अमेरिका अपनी सेना के दम पर ग्रीनलैंड पर कब्जा करता है, तो वह सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र चार्टर की आत्मा को कुचल देगा. UN चार्टर की धारा 2(4) साफ कहती है कि कोई भी देश किसी दूसरे देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल का इस्तेमाल नहीं कर सकता है. इसमें कोई अगर-मगर नहीं है. ग्रीनलैंड ने अमेरिका पर हमला नहीं किया है, न ही डेनमार्क से कोई ऐसा खतरा है जिसे आत्म-रक्षा के नाम पर जायज ठहराया जा सके. ऐसे में धारा 51 का सहारा भी नहीं लिया जा सकता.
यानी अगर अमेरिका ऐसा करता है, तो वह वही काम करेगा जिसके लिए वह दशकों से रूस, इराक या दूसरे देशों को कठघरे में खड़ा करता आया है. बलपूर्वक सीमा बदलना. फर्क बस इतना होगा कि इस बार आरोप लगाने वाला खुद आरोपी होगा.

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