
Ground Report: ‘ये मुल्क मेरी माँ है लेकिन मैंने इससे गद्दारी की…’ एक Ex-मिलिटेंट की जुबानी, कश्मीर में आतंक की कहानी!
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नब्बे के दौर में कश्मीर में मिलिटेंसी ऐसे पनप रही थी, जैसे गीली ब्रेड पर फफूंद उग आए. पाकिस्तान कश्मीरियों को अपने यहां न्यौतने लगा कि वे आएं, ट्रेनिंग ले और लौटकर अपने मिशन में लग जाएं. ऐसे ही एक एक्स-मिलिटेंट से aajtak.in की बात हुई. उस दौर में डिवीजनल कमांडर रह चुके फारूख कई बातें बताते हैं.
सरहद पार से ट्रेनिंग करके लौटा तो कश्मीर में रॉकस्टार जैसा ट्रीटमेंट मिला. कंधे पर कारतूसों की पेटी, हाथ में रिवॉल्वर और पैरों पर रुतबा. हसरत-भरी निगाहें हर वक्त पीछा करतीं. पाकिस्तान में भी रसूख कम न था. जहां भी जाते, कश्मीरी मिलिटेंट सुनते ही महंगी से महंगी चीज बेमोल मिल जाती. वक्त पलटा. हम आतंकवादी थे. घरबार छूटा. सालों जेल काटी. तब समझ आया कि जिस मां ने दूध पिलाया, लड़कपन में उसी को जख्मी कर दिया.
पहलगाम आतंकी हमले के बाद से कश्मीर में वक्त ठिठका हुआ है.
तेज हवाएं देवदार और चीड़ से गुजरती तो हैं, लेकिन संभलते हुए. झेलम और रावी में बहाव है, लेकिन रवानगी नहीं. लाल चौक में खरीदार मिलेंगे, लेकिन अपनी ही परछाई से खौफजदा.
लंबे वक्त बाद कश्मीर में उजाला छिटका था, पहलगाम हादसे ने उसे लील लिया. इस बीच बार-बार ‘नब्बे के दौर’ की जुगाली हो रही है. वो वक्त, जब घाटी में आतंकवाद को बगावत कहा जाता. आतंकियों को लड़ाका. और उनके मिशन को जंग-ए-आजादी!
उसी दशक के एक एक्स-मिलिटेंट सैफुल्लाह फारूख से aajtak.in ने मुलाकात की.
कॉल पर फारूख पहले मीटिंग का दिन अलग बताते हैं. फिर जगह. मिलने पर कहते हैं- देखभाल कर चलना होता है. कहीं जाओ, या कोई आए तो दाएं-बाएं ताकना पड़ता है. शिकारी यहां शिकार के लिए बैठा है.

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