
9 घंटे में 3 बार बदली थी पार्टी... 'आया राम, गया राम' की वो कहानी, जिसके बाद बना था दल-बदल रोकथाम कानून
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महाराष्ट्र में चल रही राजनीतिक घटनाक्रम के बाद एक बार फिर दल-बदल विरोधी कानून की चर्चा तेज हो गई है. दरअसल शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने एनसीपी से 8 विधायकों को तोड़कर शिंदे-बीजेपी सरकार को अपना समर्थन दे दिया है. वहीं शिंदे सरकार में अजित को डिप्टी सीएम भी बना दिया गया है. अब कहा जा रहा है कि शरद पवार बागी विधायकों के खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग कर सकते हैं.
Ajit Pawar vs Sharad Pawar: महाराष्ट्र की जमीन पिछले एक साल से राजनीति की नई प्रयोगशाला बनी हुई है. पहले एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे से बगावत कर बीजेपी के समर्थन से सरकार बना ली थी. तब शिंदे ने दावा किया था कि उनके पास शिवसेना के 40 विधायक हैं. उद्धव ने 16 बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने के लिए याचिका दाखिल कर दी.
ठीक ऐसी ही स्थिति महाराष्ट्र में फिर से बन गई है. अब अजित पवार ने शरद पवार से बगावत कर ली है. दावा है कि उनके पास एनसीपी के करीब 40 यानी दो तिहाई से ज्यादा विधायकों का सर्मथन है. वहीं शरद पवार भी अब अपने बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की अपील कर सकते हैं. इनकी अयोग्यता दल-बदल विरोधी कानून के तहत तय होगी.
तो आइए जानते हैं कि इस कानून की जरूरत क्यों पड़ी, इसे कब लागू किया गया और क्या है आया राम, गया राम का प्रकरण, जिसकी वजह से भविष्य में इस कानून को बनाना पड़ा?
राजनितिक दल बदल पर रोक लगाने के लिए इस कानून को लाया गया था. इसके लिए 1985 में राजीव गांधी की सरकार में संविधान में 52वां संशोधन किया गया था. इस कानून के तहत उन सांसदों या विधायकों को आयोग्य घोषित किया जा सकता है, जो किसी राजनीति दल से चुनाव चिह्न से चुनाव जीतने के बाद खुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देते हैं, पार्टी लाइन के खिलाफ चले जाते हैं, पार्टी ह्विप के बावजूद वोट नहीं करते हैं, पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करते हैं.
हालांकि इस कानून में एक अपवाद भी है. इसके तहत अगर किसी दल के एक तिहाई सदस्य अलग दल बनाना या किसी दूसरी पार्टी में विलय चाहते हैं तो उन पर अयोग्यता लागू नहीं होगा. दल बदल विरोधी कानून के प्रावधानों को संविधान की 10वीं अनुसूची में रखा गया है, लेकिन कानून बनने के बाद पहले जो दल-बदल एकल होता था, वह सामूहिक तौर पर होने लगा. इस कारण संसद को 2003 में 91वां संविधान संशोधन करना पड़ा. इसके तहत 10वीं अनुसूची की धारा 3 को खत्म कर दिया गया, जिसमें एक साथ एक-तिहाई सदस्य दल बदल कर सकते थे.
राजनीति में गया राम का किस्सा हरियाणा से जुड़ा हुआ है. यह 1967 का समय है, जब 81 सीटों वाले हरियाणा राज्य में विधानसभा चुनाव हुए थे. इस चुनाव में कांग्रेस ने बाजी मार ली थी. कांग्रेस के 48, जनसंघ के 12, स्वतंत्र पार्टी के 3, रिपब्लिकन आर्मी ऑफ इंडिया के 2 उम्मीदवारों और 16 निर्दलियों ने जीत हासिल की.

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