
हजारों करोड़ रुपये चंदा लेने वाली गुमनाम पार्टियों की जांच कौन करेगा? चुनाव आयोग के पास सीमित शक्तियां
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गुजरात में चुनाव लड़ने में नाकाम रहने वाली 10 गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को पिछले पांच सालों में 4,300 करोड़ रुपये से ज्यादा का चंदा मिला है. इन पार्टियों ने 2019 से 2024 के बीच केवल 43 उम्मीदवार उतारे और कुल 54 हजार वोट ही मिले, जबकि खर्च के आंकड़े और आय में भारी अंतर है. चुनाव आयोग ने साफ किया है कि उसके पास चंदे के स्रोत और मात्रा की जांच का अधिकार नहीं है, यह जिम्मेदारी केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) की है.
गुजरात में चुनाव लड़ने में फिसड्डी लेकिन चंदा लेने में अव्वल 10 गुमनाम राजनीतिक पार्टियों को मिले सवा चार हजार करोड़ से ज्यादा के चंदे की जांच से निर्वाचन आयोग ने हाथ खड़े कर दिए हैं. आयोग में उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक निर्वाचन आयोग के पास किसी राजनीतिक दल को प्राप्त चंदे के स्रोत या मात्रा की जांच करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. फिर चाहे वह मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या राज्य स्तरीय दल हो या पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल यानी आरयूपीपी.
आमदनी की जांच का अधिकार केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के पास भारतीय जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29 सी के अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल को वार्षिक आधार पर चुनाव आयोग के पास चंदे और अन्य संसाधनों से हुई आमदनी की रिपोर्ट दाखिल करनी होती है. उसमें एकमुश्त 20,000 रुपये से अधिक के सभी तरह के चंदा, अनुदान, दान आदि की घोषणा करनी होती है.
राजनीतिक पार्टी को अंशदान रिपोर्ट दाखिल करने के बाद संबंधित राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एक पावती जारी करते हैं. लेकिन उस चंदा आमदनी रिपोर्ट की जांच का कानूनी अधिकार केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को है.
चुनाव आयोग के पास क्या शक्तियां?
लिहाजा राजनीतिक दलों को प्राप्त और घोषित अंशदान के स्रोत और सीमा की जांच करने के लिए रिपोर्ट को वहीं भेजा जाता है. सूत्रों के मुताबिक निर्वाचन आयोग बस रजिस्टर्ड लेकिन गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों यानी आरयूपीपी को सूची से आर्थिक हेराफेरी के आरोपी दल को हटा सकता है. हटाए जाने वाले दलों में वो भी आते हैं जिसने लगातार छह वर्षों तक चुनाव नहीं लड़ा है या आयोग को अंशदान और अन्य स्रोतों से हुई आमदनी की रिपोर्ट दाखिल नहीं की है.
राहुल गांधी ने लगाए आरोप

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