
संघ के 100 साल: आज के दौर में गुरु गोलवलकर जन्म लेते तो बन जाते टीवी के ‘गूगल बॉय’
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संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर प्रखर मेधा के व्यक्ति थे. हिन्दू धर्म ग्रंथों पर चिंतन मनन, बाइबिल पढ़ना, पश्चिमी साहित्य का अध्ययन वे बचपन से ही कर रहे थे. शेक्सपीयर और बाइबिल के बारे में उनकी समझ को जान कर अंग्रेज प्रोफेसर भी हैरान हो जाते थे. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है गोलवलकर की कहानी.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ केबी हेडगेवार ने जब अपेक्षाकृत युवा माधव सदाशिवराव गोलवलकर को संघ की कमान सौंपी थी, तो देश भर में तमाम लोग हैरान थे. माधव उन लोगों में शामिल नहीं थे, जो संघ की स्थापना के समय से ही डॉ हेडगवार के साथ थे. ऐसे में आज अगर आप उनके बचपन के किस्से जानेंगे तो मान ही लेंगे कि उनसे बेहतर कोई हो नहीं सकता था. क्या बाइबिल और क्या रामचरित मानस, क्या शेक्सपियर का रचा साहित्य और क्या ‘रामरक्षा स्त्रोत्र’ के श्लोक, उनको बचपन में ऐसे कंठस्थ थे कि उनके ईसाई शिक्षक भी उनके सामने गलत साबित हो जाते थे. ये सही है कि वे आज के दौर में होते तो टीवी चैनल्स के प्रिय ‘गूगल बॉय’ होते.
अपने माता पिता की वो चौथी संतान थे, लेकिन वो अकेले ही जीवित रहे. उनसे बड़ा भाई अमृत जरूर 15 साल की उम्र तक जीवित रहा, लेकिन बाद में वो भी उन्हें अकेला छोड़ गया. डॉ हेडगेवार की तरह उनके पुरखे पुरोहित थे. मूल रूप से कोंकण के ‘गोलवली’ गांव के थे. सो अपना उपनाम ‘पाध्ये’ से बदलकर गोलवलकर कर लिया था. पहले पूरा परिवार पैंठण गया, फिर वहां से एक शाखा नागपुर तो एक रायपुर चली गई, एक पंढरपुर में भी बस गई, लेकिन गांव हमेशा के लिए ‘गोलवलकर’ के तौर पर साथ रहा.
उनके दादा, पिता नौकरियां करते थे. दादा बालकृष्ण कवर्धा कोर्ट में रीडर थे, दुर्घटना में मौत की वजह से उनके पिता पिता सदाशिवराव के सर पर जल्दी ही पूरे परिवार का बोझ आ गया था. उन्हें सब ‘भाऊजी’ कहा करते थे और उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई को ‘ताई’. मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी और डाक तार विभाग में नौकरी करने लगे. उसके बाद उनकी सरकारी अध्यापक पद पर नौकरी लगी तो एक दूर गांव (वर्तमान में छत्तीसगढ़ में) नौकरी लगी. उस गांव तक ढंग से सड़क भी नहीं थी. तांगा या बैलगाड़ी ही सहारा थे, रायपुर से भी 80 किमी अंदर होगा. लेकिन इस पूरे परिवार में पढ़ने लिखने को लेकर बड़ी ललक थी.
इसी ललक के चलते माधव के पिता ने 20 साल बाद इंटर की परीक्षा दी, और फिर इसके 7 साल बाद स्नातक किया. ऐसे में माधव पर इन सबका असर पड़ना स्वाभाविक था. छोटे से गांव में उनका परिवार ही दुनियां थी, माधव अकेले बचे तो उनको माता पिता ने लगभग सभी ग्रंथ रामायण, महाभारत से लेकर पंचतंत्र की कहानियों तक से लैस कर दिया. माधव को भी उन सबमें रुचि आने लगी थी. जब वो मिडल स्कूल में थे, तो अक्सर ऐसा होता था कि उनके शिक्षक को क्लास में माधव कोई दूसरी किताब पढ़ते दिखते थे. एक अध्यापक ने उन्हें खड़ा कर दिया और पूछा कि मैंने जो पढाया उसको बताओ, माधव ने खड़े होकर ना केवल वो सब बताया बल्कि आगे का भी बता दिया. अध्यापक हैरान थे कि ये लड़का साथी बच्चों से आगे है ही, अध्यापकों से भी दो कदम आगे चलता है. वैसे उनके पिता को बचपन से उनकी मेधा दिखने लगी थी, जब माधव 6 साल के थे, पिता ने उन्हें ‘राम रक्षा स्त्रोत’ लाकर दिया.
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हालांकि उनकी मां कभी कभी उसके श्लोक सुनाती रहती थीं, सो थोड़ा बहुत याद था. माधव ने पिताजी से कहा कि आप मुझे एक बार इसे पूरा सुना दीजिए, मैं याद कर लूंगा. माधव ने फौरन उन्हें पूरा सुना दिया. सदाशिव हैरान थे कि 6 साल का बच्चा एक बार में 38 कठिन संस्कृत श्लोक सुनकर कैसे सुना सकता है, मन में गदगद भी थे कि बच्चा उन्हीं का है. हैरान तो वो तब भी हुए होंगे जब मिडिल स्कूल में पढते हुए ही माधव ने पूरी रामचरित मानस याद कर ली थी. जबकि उनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी, मराठी थी. इस तरह माधव की चर्चा धीरे धीरे होने लगी थी. हालांकि पिता का तबादला हिंदी भाषी क्षेत्रों जैसे दुर्ग, खंडवा, रायपुर आदि में होता रहा तो मराठी के साथ साथ उनकी पकड़ हिंदी पर भी बनने लगी. लेकिन अवधी, संस्कृत और अंग्रेजी पर भी उनकी पकड़ स्कूल के दिनों में ही बन गई थी.

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