
'रूसी तेल से हटी प्राइस कैप तो...', जर्मन राजदूत ने यूक्रेन को लेकर जताई चिंता
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नई दिल्ली में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 के दूसरे दिन रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक तेल बाजार पर गहन चर्चा हुई. भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने रूस के तेल पर प्राइस कैप हटाने का विरोध किया, क्योंकि इससे रूस को युद्ध जारी रखने के लिए अधिक वित्तीय संसाधन मिल सकते हैं.
नई दिल्ली में हो रहे इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 का शनिवार को दूसरे दिन दुनिया में जारी जंग को लेकर बड़ी चर्चा हुई. कार्यक्रम के एक खास सेशन 'AMBASSADORS’ DEBRIEF Europe & America: The Diplomatic Frontline' में भारत में जर्मनी के राजदूत Dr Philipp Ackermann, भारत में इटली के राजदूत Antonio Bartoli और भारत में स्पेन के राजदूत Juan Antonio March Pujol ने शिरकत की.
भारत में जर्मनी के राजदूत Philipp Ackermann ने कहा है कि रूस के तेल पर लगाए गए प्राइस कैप को हटाना सही नहीं होगा. उनका मानना है कि अगर ऐसा किया गया तो रूस को ज्यादा पैसा मिलेगा और वह यूक्रेन में युद्ध को और लंबे समय तक जारी रख सकता है. उन्होंने कहा, 'मेरी राय है कि रूसी तेल पर कीमत की सीमा हटाना अच्छा विचार नहीं है, क्योंकि हम नहीं चाहते कि रूस को इतना पैसा मिले कि वह यूक्रेन में फिर से युद्ध शुरू कर सके या उसे जारी रख सके. उन्होंने यह भी कहा कि यूरोप रूसी तेल नहीं खरीद रहा है. 'हम रूसी तेल नहीं खरीदते और हमारे पास इसकी एक बूंद भी नहीं आती.'
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वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ रहा है जंग का असर Philipp Ackermann ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ रहा है. उनके मुताबिक स्ट्रेट ऑफ होमरुज लगभग बंद होने की स्थिति में है, जिससे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं. हमारी अर्थव्यवस्थाएं धीमी हो रही हैं और लोग असंतुष्ट हैं. यह उस युद्ध के परिणाम हैं, जिसमें हम सीधे शामिल भी नहीं हैं.' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यूरोपीय देश इस संघर्ष का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर स्थिति पर नजर रखे हुए हैं.
उनके शब्दों में, “यह हमारा युद्ध नहीं है. कोई भी यूरोपीय देश इसमें शामिल नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अमेरिका से बात नहीं करते या उनसे यह नहीं पूछते कि आगे की योजना क्या है.
जर्मन राजदूत ने यह भी कहा कि मौजूदा हालात में पश्चिम एशिया में यूरोपीय संघ का प्रभाव बढ़ता दिखाई दे रहा है. उनके मुताबिक इस क्षेत्र में पहले की तुलना में अमेरिका और इज़राइल का प्रभाव उतना मजबूत नहीं रह गया है. हालांकि उन्होंने माना कि फिलहाल यूरोप के पास ऐसा कोई बड़ा रास्ता नहीं है जिससे वह सीधे हस्तक्षेप कर युद्ध को शांति की ओर ले जा सके.

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